Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

गौर गोविन्द गँअ शुन हे रसिक जन

गौर गोविन्द-गँअ शुन हे रसिक-जन बिष्ँउ महा-बिष्ँउ पर पहुं याँर पद-नख-द्युति परम ब्रह्मेर स्थिति सुर-मुनि प्राँएर गँअ तुहुं
अर्थ

हे गौर और गोविन्द के भक्तो, हे रसिक जनो, सुनिए। वे परम प्रभु विष्णु और महाविष्णु से भी परे हैं। उनके चरणों के नखों की ज्योति में परम ब्रह्म की स्थिति है। वे मुनियों और देवताओं के प्राण हैं।

अन्तरे बरँअ भिन्न बाहिरे गौराङ्ग चिह्न श्री-राधार अङ्ग-कान्ति राजे शत-दल-कमल हेम-कर्ँइकार माझे बिहर-इ चारि द्वारि साजे
अर्थ

बाहर से उनका वर्ण गौर है, भीतर उनका वर्ण भिन्न है। बाहर की उनकी कान्ति श्रीराधा के अंगों के रंग से दमकती है। वे सहस्रदल कमल पर विहार करते हैं, ऐसे कमल पर जिसके चार द्वार हैं।

गोलोक बैकुँठ आर श्वेतद्वीप नामे सार आनन्द अपार एक नाम बासुदेब सङ्कर्षँए प्रद्युम्नानिरुद्ध-सने चारि दिके साजे चारि-धाम
अर्थ

उनके धाम गोलोक, वैकुण्ठ और श्वेतद्वीप हैं। उनका कोई भी एक नाम अपार आनन्द का अथाह सागर है। वे वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध हैं, जिनके धाम चारों दिशाओं में सजे हैं।

क्षीरोद-सागर-जले भुजङ्ग-राजेर कोले योग-निद्रा अबलम्बित लीला ताहे सब अबतरि श्वेतद्वीप अधिकारी अनन्त नित्यानन्द पेल
अर्थ

क्षीर सागर के जल पर तैरते सर्पराज की गोद में वे योगनिद्रा की लीला करते हैं। वह सर्पराज सब अवतारों का मूल है, वह श्वेतद्वीप का अधिकारी है। वही भगवान् अनन्त-नित्यानन्द हैं।

टेक
सहस्र सहस्र काँए लोलिया लोलिया पडे मुखे सृजि दु-इ जिह्वाय गौरचन्द्र गुँअ गाय पद-पद्मे महा-लक्ष्मी बुके
अर्थ

हज़ारों-हज़ारों मुखों में हज़ारों-हज़ारों चंचल दोहरी जिह्वाएँ हिलती-डुलती हैं, उनसे अनन्त-नित्यानन्द प्रभु गौरचन्द्र के गुण गाते हैं। महालक्ष्मी भगवान् विष्णु-गौरचन्द्र के चरण-कमलों को अपने वक्ष पर धारण करती हैं।

दश-शत फेँई-मँइ मुकुट्/एर साजनि श्वेत अन्/गे धरे नाना ज्योति कत कत पारिषद सनक सनातनानन्दे देब ऋषि-गँए करे स्तुति
अर्थ

अनन्त-नित्यानन्द के हज़ारों फनों में से हर एक पर मणिमय मुकुट सजा है। उनके श्वेत अंग पर अनेक रंगों की आभा झिलमिलाती है। विष्णु-गौरचन्द्र के कितने ही पार्षद हैं। सनक, सनत्कुमार और बहुत से ऋषि तथा देवता आनन्द से स्तुति करके उनकी महिमा गाते हैं।

याँर एक लोम-कूपे कतेक ब्रह्म-स्वरूपे नाना-मते सृजे सब प्रजा राम आदि अबतार अंशे परकाश याँर से सब ब्रह्माँडेर येँहो राज
अर्थ

उनके एक-एक रोमकूप से कितने ही ब्रह्मा प्रकट होते हैं। हर ब्रह्मा अनेक प्रकार से सब प्रजा की सृष्टि करता है। राम आदि अवतार उन्हीं के अंश-प्रकाश हैं, और वे ही उन सब ब्रह्माण्डों के राजा हैं।

ए हेन अनन्त-लीला मायार कत सृजिल श्री-राधार कताक्ष-बाँअ तूँए ब्रह्माँड उपरि धाम श्री-बृन्दाबन नाम गुँअ-गान करे बृन्दाबने
अर्थ

इस प्रकार भगवान् विष्णु-गौरचन्द्र की अनन्त लीलाएँ चलती रहती हैं। वे माया के कितने ही लोक रच देते हैं। उनके नेत्र तरकश हैं, जिनमें श्रीराधा की ओर चलाए जाने वाले तिरछी चितवन के बाण भरे हैं। इस भौतिक जगत् के ऊपर उनका धाम है, जिसका नाम श्रीवृन्दावन है। वहाँ वृन्दावन दास नाम का यह भक्त उनके गुण गाता है।

इस भजन के बारे में

पद
8