Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

रस सङ्केत

एबे आमि रस-तन्त्र सङ्क्षेप वर्णने प्रवृत्त हैनु, सबे शुन एक-मने ए तत्त्व बुझिते याँ’र हैबे शकति सम्भोगादि रस-गाने ह’बे ताँ’र मति
अर्थ

अब मैं संक्षेप में रस की प्रक्रिया समझाना आरम्भ करता हूँ। आप सब ध्यान से सुनें। जिनमें इस तत्त्व को समझने की क्षमता होगी, उनका मन सम्भोग-रस आदि से जुड़े गीतों की ओर आकर्षित होगा।

अखण्ड रसेर भाव – ‘रास’ बलि तारे जीवेर चरम-लाभ वेदान्त विचारे सेइ रस सिद्ध-वस्तु वैकुण्ठेर प्राण याहार साधने शिष्ट जीव यत्नवान्
अर्थ

अखण्ड रसों के भाव को ‘रास’ कहते हैं (जो रस की लीलाओं की ओर ले जाता है)। वेदान्त इसे जीव की परम प्राप्ति मानता है।* वह रस सबसे पूर्ण वस्तु है, वैकुण्ठ का प्राण है, और लगनशील जीव उसकी साधना में पूरा ध्यान लगाता है। * Bhoga-mātra-sāmya-liṅgāccha – “(जीव और ईश्वर में) केवल भोग के विषय में समानता है।” (वेदान्त-सूत्र 4.4.21)

‘विभाव’ ओ ‘अनुभाव’ आर ये ‘सञ्चारी’ एइ भाव-त्रय-व्यक्त प्रधान विहारी स्थायी-भाव स्वाद्यत्व लभिले ‘रस’ हय अलङ्कार-शास्त्रे एइ सिद्धान्त निश्चय
अर्थ

विभाव, अनुभाव और संचारी, ये तीन प्रकार के भाव मुख्य रूप से परम भोक्ता द्वारा प्रकट होते हैं। जब ये स्थायी-भाव (स्थिर भावनाएँ) के रूप में आस्वादन-योग्य हो जाते हैं, तब रस बन जाते हैं। अलंकार-शास्त्र (काव्य और सौन्दर्य-शास्त्र के ग्रन्थों) में यह सिद्धान्त निश्चित रूप से स्थापित है। *

* sthāyī-bhāvo vibhāvānubhāvaiḥ sañcāribhis tathā / svādyatvaṁ nīyamāno’sau rasa ity abhidhīyate — विभाव, अनुभाव और संचारी से पुष्ट होकर स्थायी-भाव आस्वादन-योग्य बन जाता है और रस कहलाता है। (श्रील सनातन गोस्वामी – वैष्णव-तोषणी 10.43.17)

चित्त-तत्त्व आत्मार सत्ता, ‘रति’ – ताँ’र धर्म रति ताइ ‘स्थायी-भाव, बुझ ता’र मर्म आनुकूल्यात्मिका ज्ञप्ति लिप्सोल्लासमय रतिर जानिबे एइ मूल परिचय
अर्थ

चित्-तत्त्व (आध्यात्मिक चेतना का तत्त्व) आत्मा का अस्तित्व ही है, और रति (आकर्षण) उसका स्वाभाविक धर्म है। इसलिए रति ही स्थायी-भाव है; इसका मर्म समझो। जान लो कि रति का मूल लक्षण उन अनुकूल परिस्थितियों का बोध है जो बढ़ती हुई लालसा से भरी होती हैं।

ये भाव विशेष-रूपे रसेर आश्रय रत्य्-आस्वाद-हेतु ता’र ‘विभावाख्या’ हय विभाव द्विविध – ‘आलम्बन’, ‘उद्दीपन’ तद् अभावे रतिर ना हय प्रबोधन
अर्थ

जो भाव विशेष रूप से रस का आश्रय है, वह रति के आस्वादन का कारण होने से विभाव कहलाता है। विभाव दो प्रकार का है: आलम्बन (जो आधार देता है) और उद्दीपन (जो उद्दीप्त करता है)। इनके बिना रति जाग्रत नहीं हो सकती।

विषय, आश्रय – आलम्बन द्वि-प्रकार आश्रये रतिर स्थिति, विषये प्रचार भक्त आर कृष्ण – दु’इ ‘आश्रय’, ‘विषय’ परस्पर रति-कार्ये जानह निश्चय
अर्थ

आलम्बन दो प्रकार का है: विषय (प्रेम का पात्र) और आश्रय (प्रेम करने वाला)। रति आश्रय में स्थित रहती है और विषय तक पहुँचती है। भक्त और कृष्ण क्रमशः आश्रय और विषय हैं। निश्चित जानो कि वे दोनों परस्पर प्रेम के कार्यों में लगे रहते हैं।

कृष्ण-कृष्ण-भक्त-गुण-चेष्टा – ‘उद्दीपन’ रति-कार्ये, बलिया जानह भक्त-जन आलम्बन-उद्दीपन-अभाव हैले ना हय रतिर व्यक्ति, – विज्ञ-जने बले
अर्थ

कृष्ण, तथा उनके भक्तों के गुण और चेष्टाएँ उद्दीपन (उद्दीपक) कहलाते हैं। हे भक्तजनो, इन्हें रति के कार्य जानो। ज्ञानीजन कहते हैं कि आलम्बन और उद्दीपन के अभाव में रति प्रकट नहीं होती।

‘आङ्गिक’, ‘सात्त्विक’, – ‘अनुभाव’ द्वि-प्रकार नृत्य-गीत-लुण्ठनादि – ‘आङ्गिक’ विकार स्तम्भ, स्वेद, स्वरभङ्ग रोमाञ्च, प्रलय कम्प, अश्रु, वैवर्ण – अष्ट सात्त्विक निश्चय
अर्थ

अनुभाव दो प्रकार का है: आंगिक (शारीरिक अभिव्यक्तियाँ) और सात्त्विक (भावजन्य अभिव्यक्तियाँ)। नाचना, गाना, भूमि पर लोटना आदि आंगिक विकार हैं। स्तम्भ (जड़ हो जाना), स्वेद (पसीना), स्वरभंग (आवाज़ का लड़खड़ाना), रोमांच, प्रलय (मूर्च्छा), कम्प (काँपना), अश्रु और वैवर्ण्य (रंग उड़ जाना), ये आठ सात्त्विक-भाव हैं।

‘विभाव’ कारण हय रति-प्रबोधने ‘अनुभाव’ कार्य ता’र बले बुध-गणे निर्वेदादि तेत्रिशटी भाव ये ‘सञ्चारी’ रतिर व्यापारे कभु हय सहकारी
अर्थ

ज्ञानीजन कहते हैं कि विभाव रति के जागने का कारण है, और उसका कार्य अनुभाव है (जो आध्यात्मिक भावों को प्रकट करता है)। निर्वेद (विरक्ति) आदि तैंतीस प्रकार के भाव संचारी कहलाते हैं। रति के व्यापार में वे कभी-कभी सहायक भावों का काम करते हैं। *

* kāraṇāny atha kāryāṇi sahakārīṇi yāni ca / tānyeva vyapadiśyante vibhāvādyākhyā rase — रस का अनुभव कराने वाले जो कारण, कार्य और सहायक तत्त्व हैं, वे रस के प्रसंग में विभाव आदि नामों से कहे जाते हैं। (श्रील सनातन गोस्वामी – वैष्णव-तोषणी 10.43.17) इस प्रसंग में यह समझना चाहिए कि रति नामक स्थायी-भाव स्वयं ही रस में बदल जाता है। विभाव कारण है, अनुभाव उसका कार्य है, और संचारी या व्यभिचारी-भाव सहायक भाव हैं। रस-तत्त्व का सार समझ लेने पर ही व्यक्ति व्रज-तत्त्व को समझ सकता है।

आश्रय-विषय-रूप विभाव-उदये संबन्ध-नामक भाव उदिबे हृदये शान्त, दास्य, सख्य, आर वात्सल्य, शृङ्गार ए पञ्च सम्बन्ध-भावे रतिर विहार
अर्थ

आश्रय और विषय के रूप में विभाव का उदय होने पर हृदय में सम्बन्ध नामक भाव जागता है। शान्त (तटस्थता), दास्य (सेवा-भाव), सख्य (मित्रता), वात्सल्य (माता-पिता का स्नेह) और शृंगार (दाम्पत्य प्रेम), इन पाँच सम्बन्धों में पाया जाने वाला भाव रति की क्रीड़ा-भूमि है।*

* śāntiḥ prītis tathā sakhyaṁ vātsalyaṁ priyatā ca saḥ / jñānādarasva-tulyatva-kṛpā-vallabha-bhāvataḥ — शान्ति, प्रीति, मित्रता, वात्सल्य और दाम्पत्य प्रेम, ज्ञान, आदर, समानता, कृपा और प्रियतम होने के भाव से उत्पन्न होते हैं। (श्रील सनातन गोस्वामी – वैष्णव-तोषणी 10.43.17)

अनुभाव-विभावादि सामग्री-आश्रये संबन्ध-रूपिणी रति बाडे हृदये प्रेम, स्नेह, प्रणयादि, मन, राग आर अनुराग, महाभाव, रूप प्राप्ति ताँ’र
अर्थ

अनुभाव, विभाव आदि सामग्री के आश्रय में, सभी सम्बन्धों की स्वरूप रति हृदय में बढ़ती है। इस प्रकार रति प्रेम (दिव्य प्रेम), स्नेह (प्रीति), प्रणय (गहरी प्रीति), मान (अभिमान), राग (आसक्ति), तथा अनुराग (गहरी आसक्ति) और महाभाव (परम भाव-विभोरता) का रूप लेती है।*

* ratiḥ-prema-tathā-snehaḥ praṇayo māna-rāgakau / anurāga-mahā-bhāvāvete bhāvakramā matāḥ — रति, प्रेम, स्नेह, प्रणय, मान, राग, अनुराग और महाभाव, ये भाव की क्रमिक अवस्थाएँ मानी जाती हैं। (श्रील सनातन गोस्वामी – वैष्णव-तोषणी 10.43.17)

पुष्ट-रति शृङ्गाराख्या रसता लाभिले वृन्दावने रास-लीला सहजैते मिले परब्रह्मानन्द-रूप कृष्णानन्द-रस उदिया जीवेर चित्त करे भक्ति-वश
अर्थ

जब कोई पूरी तरह पुष्ट रति, अर्थात् शृंगार नामक रस, प्राप्त कर लेता है, तब वह सहज ही वृन्दावन की रास-लीला का अनुभव करता है। परम आनन्द-स्वरूप कृष्ण का आनन्दमय रस जीव के हृदय में उदित होता है, और वह भक्ति में डूब जाता है।

कर्मानन्द, योगानन्द, ब्रह्मानन्द यत कृष्णानन्द-सूर्य-प्रति खद्योतेर मत क्षय ह’ये लुप्त हय रसेर तरङ्गे एक-मात्र रसानन्द नृत्य करे रङ्गे
अर्थ

कर्म, योग और ब्रह्म के आनन्द, कृष्ण के आनन्द रूपी सूर्य के सामने जुगनुओं जैसे हैं।* वे सब दिव्य रस की लहरों में घुलकर लुप्त हो जाते हैं। तब केवल रस का आनन्द ही उमंग से नृत्य करता है।

* brahmānando bhaved eṣa cet parārdha-guṇī-kṛtaḥ / naiti bhakti-sukhāmbhodheḥ paramāṇu-tulām api — यदि ब्रह्मानन्द को अरबों गुना भी कर दिया जाए, तब भी वह भक्ति के सुख-सागर के एक कण की भी बराबरी नहीं कर सकता। (भक्ति-रसामृत-सिन्धु 1.1.38)

ये रतिर गति कृष्णे करिनु विचार सेइ रति बद्ध-जीवे जडीय विकार भजिया आत्माके करा कृष्ण-हते दूर विषय-विलासे चेष्टा देखाय प्रचुर
अर्थ

मैंने उस रति की दिशा पर विचार किया है जो कृष्ण के लिए है। बद्ध जीवों में वह भौतिक रूप से विकृत हो जाती है, और जब उस विकृत रति का पोषण किया जाता है, तब आत्मा कृष्ण से दूर हो जाती है और इन्द्रियों के विषयों को भोगने के लिए बहुत प्रयत्न करती दिखाई देती है।

जड-गत रतिर आश्रय – दुष्ट मन जडीय-रूपादि – ता’र विषय साधन जड-मोहन भाव – उद्दीपन ता’र जड-गत-सम्बन्धे भाव-विकार
अर्थ

भौतिक रति का आश्रय दुष्ट मन है। भौतिक रूप आदि उसकी साधना के विषय बन जाते हैं। सांसारिक वस्तुओं का मोह उसका उद्दीपन बन जाता है, और भौतिक सम्बन्ध के कारण उसके भाव विकृत हो जाते हैं।

जड-रति-विषयक-शास्त्र एइ क्षणे अलङ्कार-नामे प्रचलित साधारणे काले लुप्त ब्रह्म-रति-व्याख्यान-कारण श्री-चैतन्य-अवतार माने साधु-जन
अर्थ

आजकल साधारण लोगों में अलंकार के नाम से सांसारिक आसक्ति के शास्त्र प्रचलित हैं।* समय बीतने के साथ आध्यात्मिक आसक्ति की व्याख्याएँ लुप्त होती जा रही हैं; इसी कारण साधुजन श्रीचैतन्य के अवतार को स्वीकार करते हैं।

* laghutvam atra yat prokta? tat tu prākṛta-nāyake / na kṛṣṇe rasa-niryāsa-svādārtham avatārini — (उज्ज्वल-नीलमणि 1.21) उज्ज्वल-नीलमणि के इस कथन से समझा जा सकता है कि किसी सांसारिक नायक से जुड़ी आसक्ति तुच्छ है, और ऐसी आसक्ति को दिखाने वाले अलंकार-शास्त्र (काव्य-अलंकार के सांसारिक ग्रन्थ) के वर्णन घृणित विकृतियों के सिवा कुछ नहीं हैं। मेरा विचार है कि आगे चलकर मैं अलंकारों का एक अलग संग्रह प्रकाशित करूँ, जो आध्यात्मिक रस के स्वतन्त्र और अनूठे स्वरूप को दर्शाए।

ऊर्ध्व-गत रति हाये जीवेर स्व-धर्म अधोगट रति ता’र पतनेर कर्म स्वारूप्य उभये सदा हैबे लक्षित आदर्शेर छाया बिम्ब जानह निश्चित
अर्थ

ऊर्ध्वगामी आसक्ति जीव का सच्चा स्वभाव है, और निम्न आसक्ति ऐसे कर्म कराती है जिनसे उसका पतन होता है। दोनों अवस्थाओं में सदा कुछ मिलता-जुलता रूप दिखाई देता है; निश्चित जानो कि वह आदर्श की केवल छाया या प्रतिबिम्ब है।

तथापि ‘प्राकृत’ एक, ‘अप्राकृत’ आर प्राकृत-जीवेर पक्ष तुच्छ, घृण्य, छार अप्राकृत रति-तत्त्व – जीवेर मङ्गल शिव-शुक-नारदादि भक्तस्य सम्बल
अर्थ

फिर भी, एक प्राकृत (सांसारिक) है और दूसरी अप्राकृत (दिव्य)। सांसारिक जीव के लिए पहली तुच्छ, घृणित और राख के समान व्यर्थ है। दिव्य आसक्ति का तत्त्व (रति-तत्त्व), जो जीव के लिए मंगलकारी है, शिव, शुक, नारद आदि भक्तों का धन है।

यदि चाओ नित्य-रसे करिते प्रवेश मायिक विषये नाहि कर राग-द्वेष मायिक फलित रति लक्षि’ ब्रह्म-रति सन्धान करह छाडि’ शुष्क-ज्ञान-मति
अर्थ

यदि तुम नित्य रस में प्रवेश करना चाहते हो, तो मायिक वस्तुओं के प्रति राग या द्वेष मत रखो। माया की वस्तुओं से उत्पन्न आसक्ति को देखकर आध्यात्मिक आसक्ति की खोज करो, और शुष्क बौद्धिक ज्ञान को छोड़ दो।*

* anugrahāya bhaktānāṁ mānuṣaṁ deham āsthitaḥ / bhajate tādṛśīḥ krīḍaḥ yāḥ śrutvā tat-paro bhavet — अपने भक्तों पर कृपा करने के लिए भगवान् मनुष्य-जैसा रूप धारण करते हैं और ऐसी लीलाएँ करते हैं जिन्हें सुनकर सुनने वाले उनके प्रति समर्पित हो जाते हैं। (श्रीमद्भागवत 10.33.36) श्रीमद्भागवत के रास-पंचाध्याय में शुकदेव के इस कथन से यह समझना चाहिए कि माया के प्रभाव में होने वाले सांसारिक प्रेम-व्यवहार को देखकर, और अणु-चैतन्य (सीमित चेतना) तथा विभु-चैतन्य (परम चेतना) दोनों के सम्बन्ध में परम-रति (सर्वोच्च प्रेम) का सत्य जानकर, सभी जीवों को स्वयं को गोपियों की दासियों के भाव में स्थित मानना चाहिए। ऐसा करने से वे अपने नित्य स्त्री-स्वरूप को अपनाएँगे और परम पुरुष कृष्ण को अपना एकमात्र नित्य पति स्वीकार करेंगे।

सत्य सत्य जनियाछि एइ तत्त्व, भाइ कृष्ण-भक्ति विना तव आर किछु नाइ कृष्ण-भक्ति विना यत वस्तु तुच्छ छार अमङ्गल-दाता सब – अनित्य, असार
अर्थ

हे भाई! मैं निश्चित रूप से जानता हूँ कि यह तत्त्व सत्य है! कृष्ण-भक्ति के बिना तुम्हारे लिए और कुछ नहीं है। कृष्ण-भक्ति के बिना बाकी सब कुछ तुच्छ और व्यर्थ है। वे सब अमंगल देने वाले, अनित्य और सारहीन हैं।

तोमाके कुशल-कर्मा बलिब तखन निर्-द्वन्द्वे संसार-यात्रा करिया यापन श्री-चैतन्य-रूप गुरुदेव-पदाश्रये भजिबे युगल-धन वैकुण्ठ-निलये
अर्थ

मैं तुम्हें तभी शुभ आचरण वाला कहूँगा जब तुम इस संसार में द्वन्द्व से मुक्त होकर जीवन बिताओगे, श्रीचैतन्य से अभिन्न गुरुदेव के चरणों का आश्रय लोगे, और वैकुण्ठ-धाम में दिव्य युगल रूपी उस धन का भजन करोगे।

जीवेने-मरने यबे ह’ये उदासीन ह’बे कृष्ण-रति-रस-सागरेर मीन कर्म-प्रति वीत-भाव, दया सर्व-जीवे चित्ते तव कृष्ण-भक्ति सह उपजिबे
अर्थ

जब तुम जीवन और मृत्यु दोनों के प्रति उदासीन हो जाओगे, तब तुम कृष्ण के प्रति दिव्य रति के रस-सागर में तैरती मछली के समान हो जाओगे। सभी कष्टदायक कर्मों से मुक्त भाव रखते हुए और सभी जीवों पर दया करते हुए, तुम्हारे हृदय में इन गुणों के साथ कृष्ण-भक्ति प्रकट होगी।

निराकार-साकारादि कुतर्क छाडिया सर्वत्र हेरिबे कृष्णे भक्ति-रस पिया सर्व-जीवे सम-बुद्धि हैबे यखन तोमाके कुशल-कर्मा बलिब तखन
अर्थ

निराकार और साकार के विषय में सारे व्यर्थ तर्क छोड़कर तुम भक्ति-रस का पान करोगे और सर्वत्र कृष्ण को देखोगे। जब तुम सभी जीवों को समान मानोगे, तब मैं तुम्हें शुभ आचरण वाला कहूँगा।

य भक्तिर्–व्रज-भाव-तत्त्व-विषया-चिद्-विशेषोद्वोधिनी श्री चैतन्य-प्रभो प्रसाद-विदिता माधुर्य-स्फूर्तात्मिका माया-जाल-वितान-भेदनकारिणी सायुज्य-समार्जनी सा वैकुण्ठ-विलासस्वादन-मयी जागर्तु नश् चेतसि
अर्थ

वह भक्ति, जो विशेष रूप से चित्-शक्ति और व्रज-भाव के तत्त्व को प्रकट करती है और माधुर्य-रस का स्वरूप है, केवल श्रीचैतन्य महाप्रभु की कृपा से ही जानी जाती है। वह माया के फैले हुए जाल को भेद देती है और ब्रह्म में लीन होने की इच्छा को धो डालती है। वैकुण्ठ की लीलाओं का पूरा आस्वादन करने वाली वह भक्ति मेरे हृदय में जाग्रत हो।

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