Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

शरीरेर सुखे मन देहो जलञ्जलि

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शरीरेर सुखे मन देहो जलञ्जलि ए देहो तोमार नोय बरञ्च ए सत्रु होय सिद्ध-देहो-साधन-समये सर्बदा इहार बले रोहियाछो बलि किन्तु नाहि जानो मन ए शरीर अचेतन पो'रे रोय जीबन-बिलये
अर्थ

ओ मन! शरीर के सुख को जलांजलि दे दो। यह शरीर तुम्हारा नहीं है, बल्कि सिद्ध देह की साधना के समय तो यह तुम्हारा शत्रु ही बन जाता है। फिर भी तुम सदा इसी के बल पर स्वयं को बलवान समझते रहे हो। पर ओ मन, तुम नहीं जानते कि जीवन के अंत में यह शरीर अचेत होकर गिर जाएगा और वहीं पड़ा रह जाएगा।

देहेर सौन्दर्य-बल नाहे चिरो-दिन अत एब तह लो'ये ना थाको गर्बित हो'ये तोम' प्रति एइ अनुनोय शुद्ध-जीब सिद्ध-देहे सदाइ नबीन जोरी-भूत देहो-जोग जीबनेर कर्म-भोग जीबेर पतन जोडाश्रोय
अर्थ

इस शरीर का सौंदर्य और बल अधिक दिन नहीं रहता। इसलिए इसके सहारे अभिमान मत करो, यही मेरी तुमसे विनती है। अपनी सिद्ध देह में शुद्ध जीव सदा नया रहता है। पर भौतिक शरीर से जुड़कर वह जड़वत् हो जाता है और कर्मफल भोगने लगता है। जड़ का आश्रय लेने से ही जीव का पतन होता है।

ए पर्जन्त ए देहेते जीबेर सङ्गति चखु कर्ण नास जिह्वा त्वग्-आदिर जड-स्पृहा जीबे लो'ये कोरे' टानाटानि देखो देखो भोयङ्कर जीबेर दुर्गति जीब चाइ कृष्ण भजि देहो जोडे जाय मजि' शेषे जीब पसरे आपनि
अर्थ

अब तक इस शरीर में जीव इस प्रकार बंधा रहा है, आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा आदि इंद्रियों की भौतिक वासनाएँ जीव को पकड़कर उसे इधर उधर खींचती रहती हैं। देखो, देखो, जीव की यह दशा कितनी भयानक और दुर्भाग्यपूर्ण है! जीव कृष्ण की भक्ति करना चाहता है, परंतु शरीर माया में डूबा रहने के कारण, अंत में जीव अपने आप को ही भूल जाता है।

आर केनो जीब जोडे कोरिबे समर जोड देओ बिसर्जन शुद्ध-जीब-प्रबोधन सहज-समाधि-जोगे साध क्रमे क्रमे जोड-सत्त ह'बे अबसर सिद्ध-देहो अनुगत कोरो देहो जोडाश्रित परमार्थ ना होइबे बाध
अर्थ

अब जीव जड़ से युद्ध क्यों करे? जड़ को त्याग दो, शुद्ध जीव को जगाओ, और सहज समाधि-योग का अभ्यास करो। धीरे-धीरे यह जड़ अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। भौतिक शरीर को सिद्ध देह के अनुगत कर दो, तब परमार्थ में कोई बाधा नहीं रहेगी।