शरीरेर सुखे मन देहो जलञ्जलि
ओ मन! शरीर के सुख को जलांजलि दे दो। यह शरीर तुम्हारा नहीं है, बल्कि सिद्ध देह की साधना के समय तो यह तुम्हारा शत्रु ही बन जाता है। फिर भी तुम सदा इसी के बल पर स्वयं को बलवान समझते रहे हो। पर ओ मन, तुम नहीं जानते कि जीवन के अंत में यह शरीर अचेत होकर गिर जाएगा और वहीं पड़ा रह जाएगा।
इस शरीर का सौंदर्य और बल अधिक दिन नहीं रहता। इसलिए इसके सहारे अभिमान मत करो, यही मेरी तुमसे विनती है। अपनी सिद्ध देह में शुद्ध जीव सदा नया रहता है। पर भौतिक शरीर से जुड़कर वह जड़वत् हो जाता है और कर्मफल भोगने लगता है। जड़ का आश्रय लेने से ही जीव का पतन होता है।
अब तक इस शरीर में जीव इस प्रकार बंधा रहा है, आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा आदि इंद्रियों की भौतिक वासनाएँ जीव को पकड़कर उसे इधर उधर खींचती रहती हैं। देखो, देखो, जीव की यह दशा कितनी भयानक और दुर्भाग्यपूर्ण है! जीव कृष्ण की भक्ति करना चाहता है, परंतु शरीर माया में डूबा रहने के कारण, अंत में जीव अपने आप को ही भूल जाता है।
अब जीव जड़ से युद्ध क्यों करे? जड़ को त्याग दो, शुद्ध जीव को जगाओ, और सहज समाधि-योग का अभ्यास करो। धीरे-धीरे यह जड़ अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। भौतिक शरीर को सिद्ध देह के अनुगत कर दो, तब परमार्थ में कोई बाधा नहीं रहेगी।