- पद 1भजनअहर्-विरह-सन्तप्त
गोपी-गीत-गुणोदय
जय षोकाब्धि-निस्तार
प्रकरात्युच्च-कीर्तन
“जय राधा माधव” के परिणाम
536 भजन · 902 पद भजन के शब्दों में · 608 पद अर्थ में
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1 पद भजन में
1 पद भजन में
- पद 2भजनदुष्टोपय-दुरोद्योग
षताकुलित-कंस-राट्
राजाज्णानन्दिताक्रूर
जय दान-पति-प्रिय
1 पद भजन में
- पद 1भजनजय भागवत-ष्रेष्ठ
ष्री-नारद-समीडित
अपरिच्छिन्न-सन्-मूर्ते
सर्व-जीवेष्वरेष्वर
1 पद भजन में
- पद 2भजनदुष्ट-व्योमासुर-ग्राहिन्
जय व्योम-निपातन
माया-पुत्र-गुहारुद्ध
गोप-वर्ग-विमोक्षक
1 पद भजन में
- पद 1भजनजयाक्रूर-रथारूढ
गोपी-रोदन-कातर
षकतारूढ-नन्दादि
गोपाल-गण-वेष्टित
1 पद भजन में
- पद 4भजनजयाषातन्तु-बद्धासु
कति-स्त्री-कीर्तन-प्रद
मथुरा-पदवी-वीक्षा
कुलितैकाण्गना-युत
1 पद भजन में
- पद 1भजनयमुना-मज्जिताक्रूर
जयाक्रूर-रथ-स्थित
स्वाफल्कि-जल-सन्दृष्ट
परमाष्चर्य-दर्षक
1 पद भजन में
- पद 3भजनकुब्जाकृष्टाम्बर-धर
कुब्जा-चेष्टाति-हासित
कृत-कुब्जा-समाष्वास
जय कुब्जा-वर-प्रद
1 पद भजन में
- पद 3भजनपरमानन्दित-ष्रीमद्
देवक्य्-अनकदुन्दुभे
जय प्रेम-सुखाच्छादि
ज्णान दुःख-निवारक
1 पद भजन में
- पद 1भजनजय ष्री-मथुरा-नाथ
मथुरा-मण्गल प्रभो
मधुर-मूर्त-माधुर्य
मथुरा-मण्डलेष्वर
1 पद भजन में
- पद 2भजनवलयित-बाल्य-विलास जय बल-वलित हरे
1 पद भजन में
- पद 6भजनइति स लब्ध्व वल्लभम् अनिशं मनस वलित सङ्गम्
जयति निरुपम-रुपिणि मध्ये यमुन-मनस-गङ्गम्
1 पद भजन में
- पद 1भजनराधा हरिर् अपि पुलकि-वसन्तम्
गायति निज-मुदम् अनु विकसन्तम्
1 पद भजन में
- पद 2भजनदण्डदण्डि-गते परिखण्डित-तरतम-व्यतिरोधम्
व्यतिसञ्जनम् इह भति तडिद्-घन-रुचि-जय-लसद्-उद्बोधम्
1 पद भजन में
- पद 9भजनसिन्धुग-यदु-पत्तन-हित सर्व-भुवन-लोक-महित
सम्प्रतमित-गोष्ठ-निलय गोष्ठ-नृपति-पुत्रक जय
1 पद भजन में
- पद 13भजनभक्त-प्रीति-द तत्-तद्-विड्-जय
सक्त-स्व-व्रजम् अप्तस् त्वं जय. वीर.
1 पद भजन में
- पद 7भजनसम्प्रति सह सह-जन्म गोकुलम् ऐर् निज-जन्म
जय जय जय बलराम केवलम् अनुजाराम
1 पद भजन में
- पद 5भजनतस्मादहं विगतविक्लव ईश्वरस्य
सर्वात्मना महि गृणामि यथा मनीषम्
नीचो'जया गुणविसर्गमनुप्रविष्टः
पूयेत येन हि पुमाननुवर्णितेन
1 पद भजन में
- पद 4भजनयत्र व्रजाधिप-पुराप्रतिम-प्रकाश-
प्रासाद-मूर्ध-कलशोपरि-नृत्य-रङ्गी
बर्हीक्ष्यते भुवि जय-ध्वज-केतु-भूतो
नन्दीश्वरः स मद्-अमन्द-मुदम् दधातु
1 पद भजन में
- पद 8भजनभुवम् सिञ्चन्न् अश्रु-स्रुतिभिर् अभितः सान्द्र-पुलकैः
परीताङ्गो नीप-स्तबक-नव-किञ्जल्क-जयिभिः
घन-स्वेद-स्तोम-स्तिमित-तनुर् उत्कीर्तन-सुखी
स चैतन्यः किम् मे पुनर् अपि दृशोर् यास्यति पदम्