Nandgram Dham
Nandgram Dham Vaishnava Songs · nandgramdham.org/songs

स्रि प्रेम सुध सत्त्रख्य स्रि व्र्न्दवनेस्वरि नमस्तोत्तर सत नम स्तोत्र

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AI-निर्मित अनुवाद — समीक्षा लंबित

मनसम् मनसम् त्यगद् उत्कन्थर्तम् निरुन्धतिम् रधम् सम्विद्य विद्यध्य तुन्गविद्येदम् अब्रवित्
अर्थ

राधा को विरह-वेदना से व्याकुल और अपने ही मन को थामने के लिए संघर्ष करते हुए देखकर, विदुषी तुंगविद्या ने ये वचन कहे।

विमुस्च बन्धुरे मनम् निर्बन्धम् स्र्नु मे वचह् पुर कन्दर्प-सुन्दर्यै यन्य् उत्कन्थित-चेतसे
अर्थ

हे सुन्दरी, अपना मानिनी-भाव त्याग दो और मेरे वचन ध्यान से सुनो, वे ही वचन जो बहुत पहले कंदर्प-सुंदरी को दिए गए थे, जब उसका हृदय भी विरह से भरा हुआ था।

भगवतोपदिस्तनि तव सख्योपलब्धये इन्गितभिज्सय तनि सिन्दुरेनद्य व्र्न्दय
अर्थ

वे नाम, जो स्वयं भगवान ने तुम्हारे सान्निध्य की प्राप्ति के लिए सिखाए थे, उनके संकेत को समझकर वृंदा-देवी ने आज सिंदुरा के द्वारा भेजे हैं।

विलिख्य सखि दत्तनि स जिवित-सुह्र्त्तमह् विरहर्तस् तवेमनि जपन् नमनि सम्यति
अर्थ

हे सखी, उन्हें लिखकर उसने दिए, वही जो तुम्हारे जीवन का सच्चा मित्र है, विरह से पीड़ित होकर वह केवल तुम्हारे इन नामों का जप करते हुए ही जीवित है।

रध क्र्स्न-वनधिस मुकुन्द-मधु-मधवि गोविन्द-प्रेयसि-व्र्न्द-मुख्य व्र्न्दवनेस्वरि
अर्थ

राधा, कृष्ण के वन की स्वामिनी, मुकुन्द की मधुरता की माधवी-कलिका, गोविन्द की प्रियाओं में अग्रणी, वृन्दावन की ईश्वरी।

ब्रह्मन्द-मन्दलोत्तम्स-किरिथ् कर्तिक-देवत दमोदर-प्रिय-सखि रधिक वर्सभनवि
अर्थ

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को सुशोभित करने वाला चूड़ामणि, कार्तिक मास की अधिष्ठात्री देवी, दामोदर की प्रिय सखी, राधिका, वृषभानु की पुत्री।

भनु-भक्ति-भरभिज्स व्र्सभनु-कुमरिक मुखर-प्रन-दौहित्रि किर्तिद-किर्ति-दयिनि
अर्थ

भानु के प्रति भक्ति की गहराई को जानने वाली, वृषभानु की तरुण पुत्री, दादी मुखरा के कुल का प्राण, माता कीर्तिदा को यश प्रदान करने वाली।

क्र्स्न-प्रेमब्धि-करि वत्सलच्युत-मत्र्क सखि-मन्दल-जिवतुर् ललित-जिवितधिक
अर्थ

कृष्ण-प्रेम के महासागर की सृष्टि करने वाली, अच्युत के परिवार में स्नेहपूर्वक पाली गई, सभी सखियों के समूह का प्राण, ललिता को अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय।

विसख-प्रन-सर्वस्वम् करुन्यम्र्त-मेदुर पौर्नमसि-प्र्थु-प्रेम-पत्रि सुबल-नन्दित
अर्थ

विशाखा के जीवन का सम्पूर्ण धन, करुणा के अमृत में सराबोर, पूर्णमासी के विपुल प्रेम का पात्र, सुबल जिसमें आनंदित होते हैं।

क्र्स्नधिरज-महिसि व्र्न्दरन्य-विहरिनि विसख-सख्य-विख्यत ललित-प्रेम-ललित
अर्थ

सम्राट कृष्ण की महारानी, वृंदा के वन में विहार करने वाली, विशाखा के साथ अपनी मित्रता के लिए विख्यात, ललिता के प्रेम से दुलारी गई।

सद किसोरिक गोस्थ-युवरज-विलसिनि गोविन्द-प्रेम-सिक्सर्थ-नति-क्र्त-निजम्सक
अर्थ

सदा किशोरी, गोपकुल के युवराज के साथ आनंदित होने वाली, गोविन्द को प्रेम की कला सिखाने के लिए नृत्य में सुकोमलता से झुकने वाली।

प्रबोधिनि-निसन्र्त्य-महत्म्य-भर-दर्सिनि चन्द्रकन्ति-चरि सर्व-गन्धर्व-कुल-पवनि
अर्थ

प्रबोधिनी की रात्रि के नृत्य की महिमा प्रकट करने वाली, अपनी हर गति में चंद्रमा की चांदनी के समान दीप्तिमान, गंधर्वों के समस्त कुल को पवित्र करने वाली।

स्वजन्म-भुसितोत्तुन्ग-व्र्सभनु-कुल-स्थितिह् लस्य-विद्य-व्रत-स्नत रस-क्रिददि-करनम्
अर्थ

जिसके जन्म मात्र से वृषभानु का उच्च कुल सुशोभित और महिमामंडित हुआ, नृत्य-कला के अनुशासन में निमग्न, रासलीला और ऐसी सभी लीलाओं का मूल कारण।

रसोत्सवय-पुर-गन्य क्र्स्न-नित-रहह्-स्थल गोविन्द-बन्ध-कवरि क्र्स्नोत्तम्सित-कुन्तल
अर्थ

रासोत्सव को प्रकट करने में अग्रणी, कृष्ण द्वारा एकान्त स्थान में ले जाई गई, जिसकी चोटी गोविन्द ने अपने ही हाथों से बाँधी, जिसके केश कृष्ण ने स्वयं सँवारे।

व्यक्त-गोस्थरविन्दक्सि व्र्न्दोत्कर्सति-हर्सिनि अन्न-तर्पित-दुर्वस गन्धर्व स्रुति-विस्रुत
अर्थ

जिसके कमल-नेत्र सम्पूर्ण गोप-बस्ती में विख्यात हैं, वृंदा-देवी की महिमा से परम आनंदित, जिसने दुर्वासा मुनि को भोजन देकर तृप्त किया, गंधर्वा, जो वेद-शास्त्रों में भी विख्यात है।

गन्धर्विक स्वगन्धर्व-विस्मपित-बलच्युत सन्खचुदरि-दयित गोपि-चुदग्र-मलिक
अर्थ

गांधर्विका, जिसने अपने संगीत-कौशल से तरुण अच्युत को चकित कर दिया, शंखचूड़ को परास्त करने वाले की प्रिया, गोपियों के शिखर पर सुशोभित मुकुट-माला।

चरु-गोरोचन-गौरि गरुत्मत-निभम्बर विचित्र-पत्त-चमरि-चरु-वेनि-सिख-रुचिह्
अर्थ

गोरोचन के स्वर्णिम रंग से सुंदर और गौरवर्णा, जिसका वस्त्र गरुड़ के पंखों के समान चमकता है, जिसकी सुंदर चोटी का सिरा रंग-बिरंगे रेशमी चँवर के समान चमकीला है।

पद्मेन्दु-जैत्र-वक्त्र-स्रि-निरुद्ध-मुर-मर्दन चकोरिक-चमत्करि-हरि-हरि-विलोचन
अर्थ

जिसके मुख की शोभा कमल और चंद्रमा को भी जीत लेती है, और जिससे मुरारि भी बंधे हुए हैं, जिसकी दृष्टि चकोर पक्षी को चकित कर देती है, और जिसके नेत्र हरि का हृदय ही चुरा लेते हैं।

कलिय-दमनोत्कम्पि-भन्गुर-भ्रु-भुजन्गम नसिक-सिखरलम्बि-लवलि-स्थल-मौक्तिक
अर्थ

जिसकी टेढ़ी भौंह कृष्ण द्वारा वश में किए गए कालिय सर्प के समान काँपती है, जिसकी नासिका के अग्रभाग पर लौंग के फूल जैसा कोमल मोती सुशोभित है।

बन्धुरधर-बन्धुक-विक्र्स्त-मधुसुदन दन्त-निर्धुत-सिखर सिखरिन्द्र-धर-प्रिय
अर्थ

जिसके बंधूक पुष्प जैसे रक्तिम मनोहर अधर मधुसूदन को अपनी ओर खींचते हैं, जिसके दाँत पर्वत-शिखर की श्वेतता को भी मात देते हैं, जो पर्वतराज को उठाने वाले की प्रिया है।

कपोल-मन्दलन्दोलि-मनि-कुन्दल-मन्दित पितम्सुक-सुककर्सि-निस्तल-स्तन-ददिम
अर्थ

जिसके गोल कपोलों पर झूलते रत्न-जड़ित कुण्डल सुशोभित हैं, जिसका पीत वस्त्र इतना चमकीला है कि तोते की दृष्टि भी खींच लेता है, जिसके पूर्ण गोल स्तन निर्दोष अनार के समान हैं।

मनि-किन्किन्य्-अलन्कर-झन्करि-स्रोनि-मन्दल स्थलरविन्द-विस्छोलि-निर्मस्छित-पद-द्युतिह्
अर्थ

जिसकी कमर रत्न-जड़ित झनकती घंटियों से घिरी है, जिसके चरणों की कान्ति भूमि पर उगे कमल को भी लज्जित कर देती है।

अरिस्त-वध-नर्मर्थ-निर्मपित-सरोवर गन्धोन्मदित-गोविन्दो मधव-द्वन्द्वतन्कित
अर्थ

जिसके आनंद के लिए अरिष्टासुर-वध के समय क्रीड़ावश एक सरोवर रचा गया, जिसकी सुगंध से गोविन्द स्वयं उन्मत्त हो जाते हैं, जो माधव के साथ मिलन के चिह्न धारण करती है।

कलिन्दि-कुल-कुस्ज-स्रिर् भन्दिर-तत-मन्दन ध्र्त-नन्दिस्वर-स्थेम गोवर्धन-दरि-प्रिय
अर्थ

यमुना के तट पर स्थित कुंजों की शोभा, भाण्डीर प्रदेश का आभूषण, नन्दीश्वर में सदा अटल, गोवर्धन की गुफाओं में आनंदित होने वाली।

वम्सि-बदिसिक-बिद्ध-रसोत्तर्स-मनो-झस वम्सिक-ध्वनि-विस्रम्सि-निवि-बन्ध-ग्रहतुर
अर्थ

जिसके मन की मछली, रस में सर्वोच्च होते हुए भी, उसकी बाँसुरी के काँटे में फँस जाती है, जिसकी ध्वनि सुनकर व्याकुल होकर उसकी कटि-वस्त्र की गाँठ भी खुल जाती है।

मुकुन्द-नेत्र-सफरि विहरम्र्त-दिर्घिक निज-कुन्द-कुदुन्गन्तस् तुन्गनन्ग-रसोन्मद
अर्थ

मुकुन्द के नेत्रों के समक्ष इधर-उधर तैरती मछली, उनकी क्रीड़ा की दीर्घ अमृत-सरोवर, अपने ही कुण्ड के कुंजों में दिव्य प्रेम के उदात्त रस से सदा उन्मत्त।

क्र्स्न-भ्रु-चन्द-कोदन्दोद्दिन-धैर्य-विहन्गम अनुरग-सुध-सिन्धु-हिन्दोलन्दोलितच्युत
अर्थ

जिसकी धीरता का पक्षी कृष्ण की भौंह के अर्धचंद्राकार धनुष से चौंककर उड़ जाता है, जो प्रेमासक्ति के अमृत-सागर में स्थापित झूले पर अच्युत को झुलाती है।

व्रजेन्द्र-नन्दनस्येन्दु-तुन्गितनन्ग-सगर अनन्ग-सन्गरोत्त्र्स्न-क्र्स्न-लुस्चित-कस्चुक
अर्थ

व्रज के राजकुमार रूपी चंद्रमा के नीचे जिसके भीतर प्रणय-सागर ज्वार के समान उमड़ता है, प्रेम के संग्राम के लिए उत्सुक कृष्ण द्वारा जिसकी कंचुकी उतार दी गई।

लिल-पद्म-हतोद्दम-नर्म-लम्पत-केसव हरि-वक्सो-हरि-ग्रव-हरितलिय-रेखिक
अर्थ

जो केशव को उन्मुक्त क्रीड़ा में अपने कमल से छेड़ती और चोट पहुँचाती है, जो हरि के वक्षस्थल पर हरे हरताल पाषाण के समान चमकीली रेखा अंकित करती है।

मधवोत्सन्ग-पर्यन्क क्र्स्न-बहुपधनिक रति-केलि-विसेसोह-सखि-स्मित-विलज्जित
अर्थ

जिसके लिए माधव की गोद ही शय्या और कृष्ण की भुजा ही तकिया बन जाती है, जो अपनी सखियों की जानकार मुस्कानों से लजा जाती है, जो उस प्रणय-क्रीड़ा के विवरण को भाँप लेती हैं।

अलि-पुरो-रहह्-केलि-जल्पोत्क-हरि-वन्दिनि वैजयन्ति कलभिज्स वन-स्रक्-सिल्प-कल्पिनि
अर्थ

सखियों के समक्ष हरि की स्तुति गाने और उनकी गुप्त क्रीड़ा का वर्णन करने को उत्सुक, वैजयन्ती, कलाओं में निपुण, वन-पुष्पों की माला गूँथने की कला में दक्ष।

धतु-चित्रतिवैचित्रि-विस्र्स्ति-परमेस्थिनि विअदग्धि-प्रथमचर्य चरु-चतुर्य-चित्रित
अर्थ

खनिज रंगों से चित्रकारी की अद्भुत कला में परम अधिष्ठात्री, सुरुचि-निखार की प्रथम आचार्या, सर्वत्र सुंदर चातुर्य से सुशोभित।

असधरन-सौभग्य-भग्यम्र्त-तरन्गिनि मौग्ध्य-प्रगल्भत-रम्य धिरधिरन्क-भुसित
अर्थ

अद्वितीय सौभाग्य के अमृत की लहराती नदी, निष्कपट लज्जा और साहसिक आत्मविश्वास दोनों में मनोहर, धीरा और अधीरा दोनों प्रकार की नायिकाओं के गुणों से सुशोभित।

स्यमल-प्रच्छद-पति मुक-नुपुर-धरिनि निकुस्ज-धम-सम्स्कर-मधवध्वेक्सन-क्रिय
अर्थ

श्याम घूँघट में लिपटी, बिना ध्वनि किए मौन नूपुर पहने, कुंज-निकेतन को सजाती और माधव के आगमन की उत्सुकता से प्रतीक्षा करती हुई।

प्रदुर्भुत-घनोत्कन्थ विप्रलम्भ-विसन्न-धिह् प्रतर् उत्प्रसितोपेन्द्र चन्द्रवलि-कतक्सिनि
अर्थ

जिसमें तीव्र विरह-वेदना जाग उठी है, जिसका मन वियोग में विषण्ण है, जो प्रातःकाल कृष्ण को चुटीले वचनों से उलाहना देती है, चन्द्रावली की ओर ईर्ष्यायुक्त तिरछी दृष्टि डालती हुई।

अनकर्नित-कम्सरि-ककु-वद मनस्विनि चतुकर-हरि-त्यग-जतनुसय-कतर
अर्थ

स्वाभिमानिनी, जो कृष्ण के दीन-विनयपूर्ण वचनों को सुनना भी स्वीकार नहीं करती, जो चापलूसी करते हुए हरि को भी अस्वीकार कर देती है, परंतु फिर पछतावे से व्याकुल हो उठती है।

ध्र्त-क्र्स्नेक्सनोत्सुक्य ललित-भिति-मनिनि विप्रयोग-व्यथ-हरि-हरि-सन्देस-नन्दित
अर्थ

कृष्ण को देखने की सदा उत्सुक, फिर भी ललिता की छेड़छाड़ के सामने गर्विता और सतर्क, हरि के संदेश से वियोग की पीड़ा मिटी और हृदय आनंदित हुआ।

मदल्प-जल्पितधिन-पुन्दरिकक्स-मन्दित भ्रु-लिल-मोहितोपेन्द्र-हस्तग्र-ह्र्त-वम्सिक
अर्थ

इस बात से सुशोभित कि कमल-नयन प्रभु उसके थोड़े-से, कोमल, मादक वचनों के भी वशीभूत हो जाते हैं, जो अपनी भौंहों की चंचल मुद्रा से उन्हें मोहित कर देती है और उनकी उँगलियों से बाँसुरी छीन लेती है।

अतुलच्युत-मधुर्य-स्वदनद्वैत-भग्य-भुह् नियुद्ध-स्रन्ति-निद्रन हरि-हरपहरिनि
अर्थ

अच्युत की अतुलनीय माधुर्य का आस्वादन करने के लिए सौभाग्य की अद्वितीय भूमि, जो प्रणय-क्रीड़ा से थककर निद्रामग्न हो जाती है, जो हरि के समस्त दुःख को हर लेती है।

द्युत-निर्जित-वम्सर्थि-कम्सरि-परिहसिनि निज-प्रनर्बुद-प्रेस्थ-क्र्स्न-पद-नखस्चल
अर्थ

जो कंसारि कृष्ण को छेड़ती है, जब वे द्यूत में हारकर अपनी बाँसुरी वापस माँगते हैं, जिसे वे अपने करोड़ों प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं, जिसकी कृष्ण के चरण-नखों के प्रति भक्ति कभी नहीं डिगती।

इति रध सखि-वचम् अचम्य पुलकस्चित छद्मन पद्मनभस्य लत-सद्मन्तिकम् गत
अर्थ

इस प्रकार अपनी सखी के वचनों का पान करके राधा का शरीर आनंद से रोमांचित हो उठा, और वे किसी बहाने से पद्मनाभ के कुंज-निकेतन की ओर चल पड़ीं।

यह् सेवते जनो रध-नम्नम् अस्तोत्तरम् सतम् नम्न प्रेम-सुध-सत्रम् लिह्यत् प्रेम-सुधम् असौ
अर्थ

जो कोई भक्तिपूर्वक राधा के इन एक सौ आठ नामों का पाठ करता है, जिन्हें "प्रेम-सुधा-सत्त्र" (प्रेमामृत की अन्नक्षेत्र) कहा जाता है, वह स्वयं दिव्य प्रेम के अमृत का आस्वादन करता है।