श्रीबासेर प्रति चैतन्य प्रसाद
श्रीवास पर चैतन्य महाप्रभु की कृपा देखकर सब लोग बार-बार नाचने लगे और पुकार उठे, "जय श्री चैतन्य! जय नित्यानन्द!"
श्रीवास के घर में यह कैसा भाव उठा? इसका वर्णन कौन कर सके? परस्पर विरोधी भावों का महासंग्राम छिड़ गया, और कृष्ण-प्रेम से भरा आनन्दमय रुदन प्रकट हो उठा।
चारों भाई प्रभु के चरणों में गिरकर भूमि पर लोटने लगे। प्रेम से भरकर, रोते-रोते, गद्गद स्वर में वे विनती करने लगे:
"हे प्राणेश्वर! हम प्रार्थना करते हैं कि ऐसी विपत्ति हमें प्रतिदिन मिलती रहे, जिससे आपके चरण-युगल में हमारी आसक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जाए।
"चाहे विपत्ति हो या सम्पत्ति, जिस दिन हम आपका स्मरण करते हैं, वही दिन शुभ है। हे कृष्ण! जिस दिन आपका स्मरण नहीं होता, वही दिन सचमुच विपत्ति का दिन है।
श्रीवास के परिवार के चरणों में गिरकर भक्तिविनोद कहते हैं: आप सब अपने गौर से कहकर उनकी कृपा-दृष्टि इस अभागे जीव पर भी डलवाइए।