मृत शिशु लो'ये तबे भकत बत्सल
तब भक्तवत्सल चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं मृत बालक को उठाया और भक्तों के साथ मिलकर पवित्र नाम का मंगल कीर्तन करने लगे।
गाते-गाते वे सब गंगा के तट पर पहुँचे। गंगा के जल में बालक का अन्तिम संस्कार किया गया।
गंगा देवी बोलीं, "मेरा सौभाग्य अपार है। मैंने जो व्रत रखे थे, वे आज सफल हो गए।"
चैतन्य महाप्रभु ने मृत बालक को गंगा के जल में रख दिया। बालक को गोद में लेकर गंगा देवी जल से ऊपर उठ आईं।
जल से उठकर देवी ने चैतन्य महाप्रभु के चरण-कमलों को स्पर्श किया। बालक को गोद में लिए हुए वे प्रेम से काँप उठीं।
गंगा देवी का यह प्रेमभाव देखकर भक्तगण क्षण-क्षण पवित्र नाम की मंगल-ध्वनि करने लगे।
स्वर्गलोक से आकर देवताओं ने फूलों की वर्षा की। आकाश उनके दिव्य विमानों से भर गया।
सब लोग विविध प्रकार के प्रेमभाव में डूब गए। अन्तिम संस्कार पूर्ण होने के बाद सब ने स्नान किया।
सब लोग परम आनन्द के साथ अपने-अपने घर लौट गए। भक्तिविनोद अब चैतन्य महाप्रभु के प्रेम-भाव में डूबे हुए हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- गीतमाला
- भाव
- पद
- 9