ब्राह्मणों की पत्नियों द्वारा श्री कृष्ण की स्तुति
हे प्रभु, हमारे पति, बच्चे और सम्बन्धी हमें आपके चरणों की शरण लेने से रोकने के लिए क्या कर सकते हैं? जब कोई आपका स्मरण करता है, तब भौतिक जीवन के सारे बन्धन टूट जाते हैं।
अब जब हमने आपके चरण-कमलों के दर्शन कर लिए हैं, तब हमें अपने पतियों का स्पर्श अच्छा नहीं लगता।
आप ही हमारे पति हैं। आप ही हमारी सन्तान हैं। आप ही हमारे सम्बन्धी हैं। आप ही हमारे मित्र हैं। आप नारायण हैं। हम आपको ही चाहती हैं।
हम अपने घरों के द्वारों पर क्यों लौटें? हमारे घर माया हैं। आपके सिवा कुछ भी सत्य नहीं है। बाकी सब कुछ माया की रची हुई वह पहेली है, जो भ्रम में डाल देती है।
इस संसार में किसी में भी आपकी अनन्त महिमा को पूरी तरह समझने या कहने की शक्ति नहीं है।
शिव, शुकदेव, नारद, प्रह्लाद, बलि, सनक, सनातन और ध्रुव आपकी महिमा का थोड़ा-सा कुछ समझ सकते हैं।
ब्रह्मा और सभी ऋषि आपकी महिमा का अन्त नहीं पा सकते। सभी भक्त आपके दिव्य गुणों का गान करते हैं।
आप भगवान नारायण हैं। मनुष्य जैसे रूप में आप वृन्दावन में लीलाएँ करते हैं।
हम अपने विचारों में आपको बार-बार देखेंगी। पिछले जन्मों में हमने कितने तप किए होंगे कि आज हम आपको अपनी आँखों से देख पा रही हैं?
हे भगवान नारायण, हम आपसे विनती करती हैं: कृपा करके हमारे लाए हुए इस भोजन को स्वीकार कीजिए। अब हम अपनी आँखों से आपके चरण देख सकती हैं।
अनेक जन्मों के बाद हमने आपके चरण पाए हैं। अब हमारा जीवन सफल हो गया है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गुणराज खान
- ग्रन्थ
- श्री कृष्ण विजय
- पद
- 11