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वैकुन्थ होइते स्रेस्थ

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AI-निर्मित अनुवाद — समीक्षा लंबित

वैकुन्थ होइते स्रेस्थ मथुर नगरि, जनम लभिल यथ क्र्स्नचन्द्र हरि
अर्थ

वैकुण्ठ से भी श्रेष्ठ है मथुरा नगरी, क्योंकि वहीं भगवान् कृष्णचन्द्र हरि ने जन्म लिया।

मथुर होइते स्रेस्थ व्र्न्दवन धम, यथ सधियछे हरि रसोतसव-कम
अर्थ

मथुरा से भी श्रेष्ठ है वृन्दावन-धाम, क्योंकि वहीं हरि ने रास-महोत्सव की अपनी अभिलाषा पूर्ण की।

व्र्न्दवन होइते स्रेस्थ गोवर्धन-सैल गिरिधरि-गन्धर्विक यथ क्रिद कैल
अर्थ

वृन्दावन से भी श्रेष्ठ है गोवर्धन पर्वत, क्योंकि वहीं गिरिधारी ने गान्धर्विका के साथ लीला की।

गोवर्धन होइते स्रेस्थ रध-कुन्द-तत प्रेमम्र्ते भसैल गोकुल लम्पत
अर्थ

गोवर्धन से भी श्रेष्ठ है राधा-कुण्ड का तट, क्योंकि वहीं गोकुल के उस मनमोहक चितचोर ने सारे संसार को प्रेम के अमृत में डुबो दिया।

गोवर्धन गिरि-तत रध-कुन्द छदि' अन्यत्र ये करे निज कुन्ज पुस्प-बदि
अर्थ

जो गोवर्धन पर्वत की तलहटी में स्थित राधा-कुण्ड को छोड़कर कहीं और अपना कुंज और पुष्प-वाटिका बनाता है,

निर्ब्बोध तहर सम केह नहि अर कुन्द-तिर सर्वोत्तम स्थन - प्रेमधर
अर्थ

उससे बढ़कर मूर्ख कोई नहीं है। राधा-कुण्ड का तट समस्त स्थानों में सर्वोत्तम है, वह दिव्य प्रेम का साक्षात् आगार है।