विहरति सह राधिकया रङ्गी
राधिका के साथ आनन्दपूर्वक क्रीड़ा करते हुए, आनन्द की लहरें उनके भीतर हिलोरें ले रही हैं, हरि यहाँ वृन्दावन के मधुर, मधुमय तट पर विहार कर रहे हैं।
राधा अपनी पिचकारी से अघासुर के शत्रु पर कुंकुम-घोल की फुहारें छोड़ती हैं, और वे भी उतने ही उत्साह से अपनी प्रिया को सुगन्धित कस्तूरी-जल की धाराओं से भिगो देते हैं।
वह युवा युगल एक-दूसरे पर ताजा, गहरा लाल रंग-गुलाल उछालता है, बार-बार पुकारते हुए, "मैं जीत गई! मैं जीत गया!" मानो वे अनंग कामदेव की लीला को साकार कर रहे हों।
सुबल जोर से ताली बजाकर घोषणा करते हैं, "वनमाली जीत गए!" जबकि ललिता कहती है, "देखो, मेरी सखी ने सनातन के प्रियतम को जीत लिया!"
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- रूप गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- पद
- 4