विलसति दोलोपरि वनमाली
वनमाला पहने भगवान् झूले पर क्रीड़ा कर रहे हैं, मानो काँपते, डोलते कमल के शीर्ष पर कोई भौंरा बैठा हो।
उनके चारों ओर शुभचिन्तकों की पंक्तियाँ झुककर प्रणाम कर रही हैं, और उनके आनन्दित मित्र उन्हें धीरे-धीरे आगे-पीछे झुला रहे हैं।
गोपियाँ तालियाँ बजाती हैं, और कोई ग्वालिन उनके सामने नाच रही है।
उनकी जय हो, जो साक्षात् वन के आभूषण हैं, दिव्य रस के सनातन पालक हैं!
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- रूप गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- पद
- 4