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श्रील श्रीनाथ पण्डित

कवि-कर्णपुर गोस्वामी के गुरु

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9 मिनट का पाठ 1 अध्याय

पश्चिम बंगाल के काँचरापाड़ा के रथतला क्षेत्र में श्री कृष्ण राय जीउ मन्दिर। यह आटचाला शैली का राधा-कृष्ण मन्दिर है, जिसकी स्थापना का श्रेय टीका-परम्परा श्रीनाथ पण्डित को देती है।
पश्चिम बंगाल के काँचरापाड़ा के रथतला क्षेत्र में श्री कृष्ण राय जीउ मन्दिर। यह आटचाला शैली का राधा-कृष्ण मन्दिर है, जिसकी स्थापना का श्रेय टीका-परम्परा श्रीनाथ पण्डित को देती है।Wikimedia Commons · CC BY 4.0
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परिचय

श्री चैतन्य-चरितामृत श्रीनाथ पण्डित को "चैतन्य वृक्ष" की एक शाखा के रूप में गिनाती है। आदि-लीला के दसवें अध्याय में दी गई यह सूची श्री चैतन्य महाप्रभु के पार्षदों को क्रम से गिनाती है। जिस श्लोक में उनका नाम आता है, उस पर दी गई टीका केवल नाम लेने के अलावा उनके बारे में दो बातें और बताती है। वे श्री अद्वैत आचार्य के शिष्य थे, और आगे चलकर वे स्वयं प्रसिद्ध कवि कवि-कर्णपुर गोस्वामी के गुरु बने। उसी टीका के अनुसार उन्होंने बंगाल के एक गाँव में राधा-कृष्ण के विग्रह श्री कृष्ण राय की स्थापना की। आश्चर्य की बात है कि वह मन्दिर आज भी मौजूद है। इन तीन बातों के अलावा श्रीनाथ पण्डित के अपने जीवन के बारे में बहुत कम जानकारी मिलती है। किसी भी उपलब्ध स्रोत में न उनका जन्म-वर्ष मिलता है, न परिवार का नाम, और न तिरोभाव की तिथि।

विवरणवर्णन
उल्लेखश्री चैतन्य-चरितामृत, आदि-लीला 10.107 में, चैतन्य वृक्ष की 49वीं शाखा के रूप में
गुरुश्री अद्वैत आचार्य
प्रमुख शिष्यकवि-कर्णपुर गोस्वामी (परमानन्द सेन), शिवानन्द सेन के पुत्र
पारिवारिक पृष्ठभूमिपरिवार का नाम दर्ज नहीं; कवि-कर्णपुर के गुरु-प्रणाम श्लोक में केवल इतना कहा गया है कि वे एक ब्राह्मण कुल में जन्मे थे
स्थापित विग्रहश्री कृष्ण राय, काञ्चड़ापाड़ा में, कुमारहट्टा के निकट, बंगाल
जन्म / तिरोभावकिसी भी उपलब्ध स्रोत में दर्ज नहीं

एक दृष्टि में

  • चैतन्य-चरितामृत में महाप्रभु के पार्षदों की सूची में उनका नाम आता है, लेकिन उस श्लोक में उनकी कोई व्यक्तिगत लीला नहीं बताई गई है।
  • साथ दी गई टीका उन्हें अद्वैत आचार्य का शिष्य बताती है।
  • वे कवि-कर्णपुर गोस्वामी के दीक्षा-गुरु बने। कवि-कर्णपुर आगे चलकर गौर-गणोद्देश-दीपिका के रचयिता के रूप में प्रसिद्ध हुए।
  • श्री कृष्ण राय विग्रह की स्थापना का श्रेय उन्हें दिया जाता है। उसका मन्दिर आज भी बंगाल में देखा जा सकता है।
  • उसी सूची में "श्रीनाथ" नाम के दो और व्यक्ति आते हैं। उनका इनसे कोई सम्बन्ध नहीं है, फिर भी उन्हें आसानी से इनके साथ मिला दिया जाता है।
परिचय के शास्त्र प्रमाण (3)

শ্রীনাথ পণ্ডিত—প্রভুর কৃপার ভাজন ।
যাঁর কৃষ্ণসেবা দেখি’ বশ ত্রিভুবন ॥১০৭॥

srinatha pandita -- prabhura krpara bhajana
yanra krsna-seva dekhi' vasa tri-bhuvana

शब्दार्थ

srinatha pandita -- Srinatha Pandita; prabhura -- of the Lord; krpara -- of mercy; bhajana -- receiver; yanra -- whose; krsna-seva -- worship of Lord Krishna; dekhi' -- seeing; vasa -- subjugated; tri-bhuvana -- all the three worlds.

श्रीनाथ पण्डित, उन्नचासवीं शाखा, श्री चैतन्य महाप्रभु की सम्पूर्ण कृपा के प्रिय पात्र थे। तीनों लोकों में सभी यह देखकर चकित थे कि वे किस प्रकार भगवान् कृष्ण की उपासना करते थे।

तात्पर्य से: टीका का अंश: "श्रीनाथ पण्डित, अद्वैत प्रभु के शिष्यों में से एक, शिवानन्द सेन के तीसरे पुत्र के गुरु थे, जो परमानन्द कवि-कर्णपुर के नाम से जाने जाते थे।"

Adi 10.107 Sri Chaitanya-charitamrita

वह श्लोक, जो चैतन्य-चरितामृत में महाप्रभु के पार्षदों की सूची में श्रीनाथ पण्डित का नाम लेता है। इसकी टीका उनके गुरु और उनके अपने सबसे प्रसिद्ध शिष्य का नाम बताती है।

শ্রীনাথ মিশ্র, শুভানন্দ, শ্রীরাম, ঈশান ।
শ্রীনিধি, শ্রীগোপীকান্ত, মিশ্র ভগবান্ ॥১১০॥

srinatha misra, subhananda, srirama, isana
srinidhi, sri-gopikanta, misra bhagavan

शब्दार्थ

srinatha misra -- Srinatha Misra; subhananda -- Subhananda; srirama -- Srirama; isana -- Isana; srinidhi -- Srinidhi; sri-gopikanta -- Sri Gopikanta; misra bhagavan -- Misra Bhagavan.

पचपनवीं शाखा श्रीनाथ मिश्र थे, छप्पनवीं शुभानन्द, सत्तावनवीं श्रीराम, अट्ठावनवीं ईशान, उनसठवीं श्रीनिधि, साठवीं श्री गोपीकान्त, और इकसठवीं मिश्र भगवान् थे।

Adi 10.110 Sri Chaitanya-charitamrita

यह श्लोक यह दिखाने के लिए दिया गया है कि श्रीनाथ मिश्र आदि 10.107 के श्रीनाथ पण्डित से अलग हैं। श्रीनाथ मिश्र चैतन्य-वृक्ष की एक अलग शाखा हैं, और दूसरी जगह उन्हें गोपी चित्राङ्गी बताया गया है।

শ্রীনাথ চক্রবর্তী, আর উদ্ধব দাস ।
জিতামিত্র, কাষ্ঠকাটা–জগন্নাথদাস ॥৮৪॥

srinatha cakravarti, ara uddhava dasa
jitamitra, kasthakata-jagannatha-dasa

शब्दार्थ

srinatha cakravarti -- Srinatha Cakravarti; ara -- and; uddhava dasa -- Uddhava dasa; jitamitra -- Jitamitra; kasthakata jagannatha-dasa -- Kasthakata Jagannatha dasa.

पन्द्रहवीं शाखा श्रीनाथ चक्रवर्ती थे, सोलहवीं उद्धव दास, सत्रहवीं जितामित्र, और अठारहवीं जगन्नाथ दास।

तात्पर्य से: टीका का अंश: "शाखा-निर्णय, श्लोक 13, में श्रीनाथ चक्रवर्ती को समस्त सद्गुणों के भण्डार और भगवान् कृष्ण की सेवा में निपुण बताया गया है।"

Adi 12.84 Sri Chaitanya-charitamrita

यह श्लोक यह दिखाने के लिए दिया गया है कि श्रीनाथ चक्रवर्ती आदि 10.107 के श्रीनाथ पण्डित से अलग हैं। श्रीनाथ चक्रवर्ती एक अलग शाखा हैं, जिनका नाम विशेष रूप से अद्वैत आचार्य की अपनी विस्तार-परम्परा में आता है (जीवनी में देखें "कौन-से श्रीनाथ?")।

अध्याय 1

विरासत

श्रीनाथ पण्डित द्वारा स्थापित श्री कृष्ण राय विग्रह की सेवा उनके तिरोभाव के चार शताब्दियों से भी अधिक समय बाद तक चली आ रही है।

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काँचरापाड़ा में श्री कृष्ण राय जीउ मन्दिर का एक और दृश्य। इसका पुनर्निर्माण 1785-86 में मल्लिक भाइयों ने किया था, और यह आज भी श्रीनाथ पण्डित द्वारा की गई मूल स्थापना के स्थान पर खड़ा है।
काँचरापाड़ा में श्री कृष्ण राय जीउ मन्दिर का एक और दृश्य। इसका पुनर्निर्माण 1785-86 में मल्लिक भाइयों ने किया था, और यह आज भी श्रीनाथ पण्डित द्वारा की गई मूल स्थापना के स्थान पर खड़ा है।Wikimedia Commons · CC BY 4.0

श्रीनाथ पण्डित के जीवन का केवल एक भाग इतिहास से लुप्त नहीं हुआ है, और वह है उनके द्वारा बनवाया गया मन्दिर। कृष्णदास कविराज गोस्वामी के श्री चैतन्य-चरितामृत से जुड़ी टीका-परम्परा उन्हें श्री कृष्ण राय नाम के विग्रह की स्थापना का श्रेय देती है। उन्होंने एक ऐसा स्थान छोड़ा, जिसके दर्शन आज भी बंगाल में किए जा सकते हैं। उसकी दीवार पर एक शिला-पट्ट लगा है, जिस पर उनका नाम और उनके पिता तथा पितामह के नाम अंकित हैं।

विवरणवर्णन
विग्रहश्री कृष्ण राय (राधा-कृष्ण)
मूल स्थलकाञ्चड़ापाड़ा, कुमारहट्टा/कामारहट्टा से लगभग डेढ़ मील दूर, बंगाल
वर्तमान स्थानरथतला क्षेत्र, काञ्चरापाड़ा, उत्तर 24 परगना, पश्चिम बंगाल
वर्तमान भवन का निर्माणशकाब्द 1708 (सन् 1785-86), कलकत्ता के पाथुरियाघाटा के भाइयों निमाई चरण और गौर चरण मल्लिक द्वारा
सहोदर विग्रह (परम्परा)वल्लभपुर के राधावल्लभ; खड़दह के श्यामसुन्दर
पत्थर की परम्परागत उत्पत्तिकहा जाता है कि इसे मुर्शिदाबाद से नित्यानन्द प्रभु के पुत्र वीरभद्र प्रभु लाए थे

काञ्चड़ापाड़ा का एक मन्दिर #

श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने चैतन्य-चरितामृत, आदि 10.107 पर अपनी अनुभाष्य टीका में बताया है कि काञ्चड़ापाड़ा गाँव कुमारहट्टा से लगभग डेढ़ मील दूर था। कुमारहट्टा स्वयं कलकत्ता से कुछ मील दूर है। शिवानन्द सेन भी इसी क्षेत्र में रहते थे। वे वही गृहस्थ भक्त थे, जो श्री चैतन्य महाप्रभु के अपने घरेलू कामों की व्यवस्था करते थे। उन्होंने वहाँ श्री गौर-गोपाल का अपना मन्दिर बनवाया था। श्रीनाथ पण्डित का मन्दिर उससे थोड़ी ही दूरी पर था। उसमें श्री कृष्ण राय नाम से राधा-कृष्ण के विग्रह विराजमान थे। इस प्रकार यह एक अलग मन्दिर था, जिसमें विग्रहों की एक अलग जोड़ी थी, और यह बंगाल के उसी छोटे-से क्षेत्र में था। इसी क्षेत्र में श्रीनाथ पण्डित के भावी शिष्य कवि-कर्णपुर गोस्वामी भी बड़े हुए।

उसी पत्थर से दो और विग्रह #

अनुभाष्य एक विशेष बात और जोड़ती है, लेकिन वह इसे पक्के इतिहास के रूप में नहीं, केवल जनश्रुति के रूप में बताती है। कहा जाता है कि नित्यानन्द प्रभु के पुत्र वीरभद्र प्रभु मुर्शिदाबाद से एक बड़ा पत्थर लाए थे। उससे तीन अलग-अलग विग्रह गढ़े गए: वल्लभपुर का राधावल्लभ विग्रह, खड़दह का श्यामसुन्दर विग्रह, और काञ्चड़ापाड़ा आया श्री कृष्ण राय विग्रह। यदि यह परम्परा सही है, तो एक ही पत्थर श्रीनाथ पण्डित के विग्रह को बंगाल के दो और प्रसिद्ध मन्दिरों से जोड़ता है। कहा जाता है कि यह पत्थर नित्यानन्द प्रभु के पुत्र लाए थे, इसलिए यह विग्रह नित्यानन्द प्रभु के परिवार से भी जुड़ जाता है। इस कथा की हर बात को स्वतन्त्र रूप से जाँचा जा सके या नहीं, इससे यह तो पता चलता है कि श्रीनाथ पण्डित के बाद की पीढ़ियों ने इस मन्दिर को किस प्रकार याद रखा।

मल्लिक बन्धुओं द्वारा पुनर्निर्माण #

मूल मन्दिर गंगा के तट पर था, और समय के साथ वह टूट-फूट गया। अनुभाष्य में लिखा है कि कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित ज़मींदार निमाई मल्लिक ने बनारस जाते समय कृष्ण राय के इस टूटे हुए मन्दिर को देखा। बाद में उन्होंने उसी स्थान पर वह बड़ा मन्दिर बनवाया, जो आज भी मौजूद है। इसका निर्माण शकाब्द 1708, अर्थात् सन् 1785-86 में पूरा हुआ। विकिमीडिया कॉमन्स पर इस मन्दिर के छायाचित्र हैं, जो पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना ज़िले में, आज के काञ्चरापाड़ा के रथतला क्षेत्र में लिए गए थे। उनके विवरण इसे अष्टचाल, अर्थात् आठ छतों वाली, संरचना बताते हैं, जिसका बरामदा तीन मेहराबों पर बना है। वहाँ इस मन्दिर का श्रेय दो भाइयों, निमाई चरण और गौर चरण मल्लिक, को दिया गया है। अनुभाष्य एक ही निर्माता की बात करती है, जबकि छायाचित्र वाले मन्दिर का अपना विवरण दो भाइयों का नाम लेता है। ये दोनों बातें आवश्यक रूप से एक-दूसरे के विरुद्ध नहीं हैं, क्योंकि ऐसे बड़े पारिवारिक मन्दिरों का श्रेय प्रायः परिवार के एक से अधिक सदस्यों को दिया जाता था। इसलिए यहाँ किसी एक को चुनने के बजाय दोनों विवरण दिए गए हैं। भक्तिसिद्धान्त सरस्वती की टीका आगे बताती है कि मन्दिर के सामने एक बड़ा आँगन है, अतिथियों के ठहरने के लिए कमरे हैं, और प्रसादम् पकाने की व्यवस्था है। पूरा परिसर ऊँची दीवारों से घिरा है। टीका के अनुसार भीतर लगे एक शिला-पट्ट पर श्रीनाथ पण्डित का नाम उनके पिता और पितामह के नामों के साथ अंकित है, और मन्दिर-निर्माण की तिथि भी लिखी है।

आज भी जारी है सेवा #

आज काञ्चरापाड़ा में खड़ा यह मन्दिर बड़ा है। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के विवरण इसे बंगाल के प्रसिद्ध महेश मन्दिर के लगभग बराबर बड़ा बताते हैं। छायाचित्र भी दिखाते हैं कि यह एक बड़ा भवन है, जिसकी आज भी देखभाल होती है। gaudiyahistory.iskcondesiretree.com पर श्रीनाथ पण्डित के जीवनी-पृष्ठ में बताया गया है कि "उनका श्री कृष्ण राय विग्रह आज भी वहाँ विराजमान है"। यह एक छोटा लेकिन वास्तविक संकेत है कि उनकी शुरू की हुई सेवा उनके बाद चार शताब्दियों से भी अधिक समय से चल रही है। फिर भी उनके अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में लगभग कुछ भी नहीं बचा है।

इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (1)

तात्पर्य से: टीका का अंश: "एक शिला-पट्ट पर श्रीनाथ पण्डित तथा उनके पिता और पितामह के नाम एवं मन्दिर-निर्माण की तिथि अंकित है।"

Adi 10.107 Sri Chaitanya-charitamrita

वही टीका जो श्रीनाथ पण्डित को अद्वैत आचार्य के शिष्य के रूप में बताती है, वह कृष्ण राय मन्दिर के शिला-पट्ट और निर्माण-इतिहास का विस्तृत विवरण भी देती है।

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उपसंहार

चैतन्य वृक्ष में उल्लेख #

श्री चैतन्य-चरितामृत आदि-लीला के दसवें अध्याय में श्री चैतन्य महाप्रभु के पार्षदों की एक क्रमबद्ध सूची देती है। इसमें पार्षदों को एक विशाल "चैतन्य वृक्ष" की शाखाओं और उपशाखाओं के रूप में बताया गया है। श्रीनाथ पण्डित का नाम वहाँ उनचासवीं शाखा के रूप में आता है: "श्रीनाथ पण्डित, उनचासवीं शाखा, श्री चैतन्य महाप्रभु की सम्पूर्ण कृपा के प्रिय पात्र थे। तीनों लोकों में सभी यह देखकर चकित थे कि वे किस प्रकार भगवान् कृष्ण की उपासना करते थे" (चैतन्य-चरितामृत, आदि 10.107)। कृष्णदास कविराज गोस्वामी इस श्लोक में उनके बारे में कोई और कथा नहीं देते। इस लम्बी सूची के अधिकांश नामों को केवल एक-दो पंक्तियाँ ही मिलती हैं। लेकिन श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर की अनुभाष्य टीका उनके बारे में ठोस और विशेष जानकारी जोड़ती है कि वे कौन थे और उन्होंने क्या किया। यह टीका श्रील प्रभुपाद के अपने अंग्रेज़ी संस्करण के साथ छपी है।

अद्वैत आचार्य के शिष्य #

वह टीका साफ-साफ बताती है कि श्रीनाथ पण्डित श्री अद्वैत आचार्य के शिष्यों में से एक थे। इससे गौड़ीय वैष्णव परिवार की एक जानी-पहचानी और लिखित रूप में दर्ज शाखा में उनका स्थान तय होता है। यह शाखा उन शिष्यों और सहयोगियों की थी, जो अद्वैत आचार्य के घर-परिवार के आस-पास एकत्र थे। इस एक तथ्य के अलावा कोई भी उपलब्ध स्रोत यह नहीं बताता कि श्रीनाथ पण्डित कहाँ जन्मे, उनके परिवार का क्या नाम था, या वे किस समय हुए। इसका केवल एक आंशिक अपवाद है। वह चैतन्य-चरितामृत में नहीं, बल्कि उनके अपने शिष्य के लेखन में मिलता है।

एक महान कवि के गुरु #

आज श्रीनाथ पण्डित को सबसे अधिक एक ही सम्बन्ध के लिए याद किया जाता है, जिसके अच्छे प्रमाण मिलते हैं। वे परमानन्द सेन के दीक्षा-गुरु थे। परमानन्द सेन शिवानन्द सेन के सबसे छोटे पुत्र थे और बड़े होकर प्रसिद्ध संस्कृत कवि कवि-कर्णपुर गोस्वामी बने। कवि-कर्णपुर अपने ग्रन्थ श्री आनन्द-वृन्दावन-चम्पू का आरम्भ श्रीनाथ पण्डित के सम्मान में एक गुरु-प्रणाम श्लोक से करते हैं (ऊपर पूर्ण रूप से उद्धृत)। इसमें वे श्रीनाथ पण्डित को प्रणाम करते हैं, जिनकी हरि-कथा सुनकर हर सुनने वाला सांसारिक आसक्ति से मुक्त हो जाता था। यही श्लोक एकमात्र उपलब्ध स्रोत है, जो श्रीनाथ पण्डित के परिवार के बारे में कुछ भी कहता है। इसमें कहा गया है कि वे "एक ब्राह्मण कुल में प्रकट हुए", लेकिन परिवार का नाम नहीं दिया गया। इस सम्बन्ध के बारे में बाकी सब कुछ चैतन्य-चरितामृत की टीका से पता चलता है, जो कवि-कर्णपुर के गुरु के बारे में बताती है। इसमें से कुछ भी श्रीनाथ पण्डित के अपने कहे या किए किसी कार्य के वर्णन से नहीं आता।

कौन-से श्रीनाथ? #

चैतन्य-चरितामृत की सूचियों में "श्रीनाथ" से बने नाम एक से अधिक बार आते हैं, और ग्रन्थ स्वयं उन्हें अलग-अलग व्यक्ति मानता है। आदि-लीला के दसवें अध्याय में एक अलग व्यक्ति, श्रीनाथ मिश्र, को वृक्ष की पचपनवीं शाखा के रूप में गिनाया गया है (आदि 10.110)। कवि-कर्णपुर के अपने ग्रन्थ गौर-गणोद्देश-दीपिका में उन्हें कृष्ण की वृन्दावन-लीलाओं की गोपी चित्राङ्गी बताया गया है। वे आदि 10.107 वाले श्रीनाथ पण्डित से अलग व्यक्ति हैं। दोनों के नाम में केवल पहला भाग एक जैसा है, जो एक सामान्य नाम है। आदि-लीला का बारहवाँ अध्याय अलग से अद्वैत आचार्य की अपनी विस्तार-परम्परा की सूची देता है। वहाँ एक और श्रीनाथ का नाम आता है, श्रीनाथ चक्रवर्ती, जो पन्द्रहवीं शाखा हैं (आदि 12.84)। शाखा-निर्णय में उनकी प्रशंसा "समस्त सद्गुणों के भण्डार और भगवान् कृष्ण की सेवा में निपुण" कहकर की गई है। चैतन्य-चरितामृत इन्हें अलग-अलग अध्यायों में अलग-अलग प्रविष्टियों के रूप में ही रखती है। बाद की कुछ पुस्तकें, जो द्वितीयक स्रोत हैं, श्रीनाथ चक्रवर्ती और श्रीनाथ पण्डित को मिलाकर एक ही व्यक्ति मान लेती हैं, मानो एक ही व्यक्ति की दो उपाधियाँ हों। लेकिन न चैतन्य-चरितामृत में और न उसकी अपनी अनुभाष्य टीका में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ये दोनों एक ही व्यक्ति हैं। मूल ग्रन्थ के अनुसार यह पृष्ठ श्रीनाथ पण्डित को केवल वही व्यक्ति मानता है, जिनका नाम आदि 10.107 में आता है: कवि-कर्णपुर के गुरु और नीचे बताए गए विग्रह के संस्थापक।

Nandgram Dham
सत्यापित शास्त्रीय
लेखक
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समीक्षक
मंदिर एवं शास्त्रीय शोध टीम
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