अग्रे एक निबेदन कोरि मधुनिसूदन
हे कृष्ण! मैं आपके समक्ष एक प्रार्थना रखता हूँ। कृपा करके सुनिए। मेरे ये शब्द व्यर्थ नहीं हैं, इनमें गहरा अर्थ छिपा है। ये हृदय से निकले हैं।
मैं अत्यन्त पतित हूँ, और आप परम दयालु हैं। इसलिए मैं आपकी कृपा का अधिकारी हूँ। जो व्यक्ति जितना अधिक पतित होता है, आपकी कृपा उसके लिए उतनी ही अधिक होती है। इसलिए मैं आपकी कृपा का सर्वथा योग्य पात्र हूँ।
यदि आप मुझे त्याग देंगे, तो अपनी कृपा के लिए ऐसा पात्र आपको कहाँ मिलेगा? तब आपका नाम 'दयामय' मिट जाएगा। भक्तिविनोद कहते हैं, हे दयामय! कृपा कीजिए। तभी आपकी 'दयालु भगवान्' की कीर्ति सदा-सर्वदा बनी रहेगी।