अजि रसे बादर निशि
आज रात रस की वर्षा हो रही है। वृन्दावन के सभी निवासी प्रेम में तैर रहे हैं।
श्याम-घन प्रेम-अमृत की धारा बरसा रहा है, और उल्लासित राधा उसकी गोद में बिजली बनकर विचर रही हैं।
प्रेम से रास्ता फिसलन-भरा हो गया है, और चाल टेढ़ी-मेढ़ी हो गई है। कस्तूरी, चन्दन और कुंकुम से वहाँ कीचड़ बन गया है।
प्रेम का यह सागर चारों दिशाओं में असीम फैला है। नरोत्तम दास तैरना नहीं जानते, और वे उसमें डूब गए।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरोत्तम दास ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- प्रार्थना
- भाव
- पद
- 4