अक्रोध परमानन्द
आदरणीय भगवान् नित्यानन्द राय कभी क्रोध नहीं करते, क्योंकि वे परम दिव्य आनन्द के साक्षात् स्वरूप हैं। मिथ्या अहंकार की किसी भी धारणा से रहित निताई नगर में घूमते हैं।
सबसे पतित और अधम जीवों के घरों में घर-घर जाकर वे हरिनाम महामंत्र का दान मुक्त हाथों से बाँटते हैं।
वे जिसे भी देखते हैं, दाँतों में तिनका दबाकर उससे कहते हैं, “गौरहरि का भजन करके मुझे खरीद लीजिए!” (“हे मेरे प्यारे भाई! मैं तुम्हारे चरण पकड़ता हूँ! हे माधाई, मैं तुम्हारे चरणों में विनती करता हूँ कि बस एक बार ‘हरि, हरि!’ बोल दो। केवल एक बार, प्रिय माधाई, बस ‘गौर हरि!’ बोल दो। उनका पवित्र नाम बोलो और तुम इस भौतिक संसार से उद्धार पा जाओगे।”)
ऐसा कहकर नित्यानन्द प्रभु भूमि पर लोटने लगते हैं, मानो कोई सोने का पर्वत धूल में लोट रहा हो। (वे धरती पर धूल में लोटते हैं। वे ठीक वैसे दिखते हैं जैसे सोने का पर्वत पृथ्वी पर लुढ़क रहा हो। सोने का वह पर्वत धूल में लोटते हुए ‘गौर हरि हरि!’ की गर्जना करता है, और फिर ‘गौर हरि हरि!’ बोलता है।)
लोचन दास कहता है, “जिसके मन में ऐसे अवतार के प्रति प्रीति जागी ही नहीं, वह पापी जन्म और मृत्यु के चक्र में व्यर्थ ही आता और जाता रहता है।”
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- लोचन दास ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- वैष्णव आचार्यों के और भजन
- पद
- 5
- रिकॉर्डिंग
- 7 इस गायक के और भजन इस रचयिता के और भजन
ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री, इस्कॉन भक्त। सभी भक्त गायकों की जय।