निताइ मोर जीबन धन
भगवान् निताई मेरे जीवन का धन हैं। निताई ही मेरा कुल हैं। मेरे जीवन में निताई के सिवा और कोई लक्ष्य नहीं है।
सांसारिक सुखों में जो सबसे अच्छा सुख है, वह भी मेरे हृदय में राख के ढेर की तरह व्यर्थ है। मैं नगर में भिक्षा माँगूँगा। उसी से मैं खाऊँगा। मैं भगवान् निताई का नाम गाता रहूँगा।
जिस देश में भगवान् निताई नहीं रहते, मैं उस देश में नहीं जाऊँगा। जो व्यक्ति निताई से विमुख है, मैं उसका मुख नहीं देखूँगा।
गंगा भगवान् निताई के चरण धोने वाला जल है, जिसे भगवान् शिव अपने सिर पर धारण करते हैं। जो ऐसे भगवान् निताई का भजन नहीं करता, वह केवल दुःख पाकर मरता है।
लोचन दास घोषणा करता है, “जिसे मेरे निताई के प्रति आदर नहीं है, मैं उसका मुख आग से झुलसा दूँगा!”
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- लोचन दास ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- और भजन
- पद
- 5
- रिकॉर्डिंग
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ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री। सभी भक्त गायकों की जय।