एक दिन मने पहुं कैल आचम्बित
एक दिन भगवान् गौर के मन में अचानक विचार आया, “वहाँ के लोगों के हित के लिए मैं पूर्व की ओर जाऊँगा।”
अपने निकटतम साथियों को साथ लेकर भगवान् गौर पूर्व की ओर यात्रा पर निकलने वाले थे। माता शची के जीवन-स्वरूप वे यात्रा के लिए बेचैन थे।
भगवान् गौर ने अपनी माता से कहा, “आप चिन्ता न कीजिए। मैं सदा आपके पास ही रहूँगा।”
लक्ष्मीप्रिया से भगवान् गौर ने मुस्कराकर कहा, “मेरी माता की सेवा करो। उनकी सेवा में तत्पर रहो।”
अपने निकटतम साथियों के साथ भगवान् गौर ने शुभ यात्रा आरम्भ की। वे प्रसन्न हृदय से भ्रमण करते रहे।
ब्राह्मण और सज्जन पद्मावती के तट पर रहते थे। वहाँ के घाटों पर तेजस्वी दिव्य पुरुष और स्त्रियाँ स्नान करते थे।
जब भगवान् विश्वम्भर ने उस पद्मावती में स्नान किया, तब वहाँ स्नान करने वाले सब लोग पापों से मुक्त हो गए।
पूर्व के देश में जो लोग रहते थे, भगवान् गौर ने उन सबसे विनती की कि वे पवित्र नाम को स्वीकार करें। उन्होंने उन्हें भगवान् कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन दिया।
उन्होंने इस पर विचार नहीं किया कि कौन शुद्ध है और कौन अशुद्ध, या किसने अच्छा आचरण किया और किसने बुरा। उन्होंने सबको जन्म और मृत्यु की नदी के उस पार पहुँचा दिया।
भगवान् गौर ने नाम-संकीर्तन (पवित्र नामों के कीर्तन) की नाव सजाई। उन्होंने स्वयं सबसे विनती की कि वे उस नाव में बैठें। उसी नाव से उन्होंने सबको जन्म और मृत्यु की नदी के उस पार पहुँचा दिया।
जो कोई उनसे भागा, उसे उन्होंने बाँहों में भर लिया। स्वयं भगवान् कृष्ण ही जो भगवान् गौरांग हैं, उन्होंने ऐसे लोगों को भी जन्म और मृत्यु की नदी के उस पार पहुँचा दिया।
लोचन दास कहता है: भगवान् गौर सब लोकों के स्वामी हैं। लोगों पर कृपा करके उन्होंने सबके हृदय को शुद्ध कर दिया।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- लोचन दास ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- पद
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