घरेरे आ इल प्रभु रत्न लैञा
भगवान् गौर बहुत-से रत्न लेकर घर लौट आते हैं। जो धन वे लाए थे, वह माता शची को प्रसन्नता से दे देते हैं।
भगवान् गौर प्रणाम करते हैं और माता के मुख की ओर देखते हैं। शची का मुख उतरा और मुरझाया हुआ है, वे एक शब्द भी नहीं बोलतीं।
भगवान् गौर कहते हैं, “माँ, आपका मुख इतना उतरा और मुरझाया हुआ क्यों है? आपको इतना उदास देखकर मेरा हृदय जल उठता है।”
ये शब्द सुनकर शची गद्गद् स्वर में टूटे-टूटे शब्द बोलती हैं। उनकी आँखों से आँसू धारा बनकर बहते हैं और छाती पर का वस्त्र भिगो देते हैं।
उनमें कुछ बोलने की शक्ति नहीं है। शोक से उनका कण्ठ भर आया है। अन्त में वे कहती हैं, “मेरी बहू वैकुण्ठ चली गई।”
भगवान् गौर कहते हैं, “शोक छोड़ दीजिए। हे माँ, मेरी बात सुनिए। कोई भी अपने भाग्य को मिटा नहीं सकता, वह भाग्य जिसे ब्रह्मा उसके मस्तक पर लिखते हैं।”
अपने पुत्र के वचन ध्यान से सुनकर शची ने शोक नहीं किया। उन्होंने अपने हृदय में भी शोक नहीं किया।
लोचन दास कहता है: कृपया यह लीला सुनिए, लक्ष्मीप्रिया के वैकुण्ठ जाने की लीला। इसी तरह मैंने भगवान् विश्वम्भर की लीलाओं का गान किया है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- लोचन दास ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- पद
- 8