आमि अति पामर दुर्जन
मैं अत्यंत पापी और दुष्ट हूँ। हाय, हाय! मैंने यह अमूल्य जीवन माया का दास बनकर व्यर्थ बिता दिया।
गर्भ में न जाने कितने दिन मैंने यूँ ही बिता दिए। मेरा बचपन खेल-कूद में बीत गया। यह जवानी मैंने गृहस्थी के विषय-भोग में व्यर्थ गँवा दी। अब अंत में बुढ़ापा आ गया है।
विषय भोग में अब सुख नहीं रहा, भोग की शक्ति भी जाती रही। अंत में दाँत और शरीर शक्तिहीन हो गए। यह जीवन कष्टों से भरा है, और मृत्यु का भय सदा बना रहता है। कहो, ऐसे जीवन से कोई कैसे प्रेम कर सकता है?
जब तक शरीर में बल था, तब तक भोग की वस्तुओं और भोग शक्ति में मेरी आसक्ति बनी रही। अब वह सब जाती रही। बताओ, अब मैं किस सहारे रहूँ? अब मेरा चित्त सदा चंचल रहता है।
जब तक शरीर में शक्ति थी, हाय, मैंने हरि की भक्ति नहीं की। अब अंतिम समय आ गया है, अब क्या करूँ? धिक्कार है मेरे इस जीवन को। मैंने नित्य धन की साधना नहीं की। अपने सच्चे मित्र को छोड़कर मैंने अपने ही शत्रुओं की सेवा की।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- कल्याण-कल्पतरु
- भाव
- पद
- 5