अपूर्ब बैष्णब तत्त्व आत्मार आनन्द
अद्भुत है वैष्णव तत्त्वज्ञान, जो आत्मा के आनंद का ऐसा स्रोत है जिसकी इस संसार में कोई तुलना नहीं। यह आत्मा का अपना स्वधर्म है, जिसका बोध इसी तत्त्वज्ञान से होता है। हे जगत, इस तत्त्व का वर्णन सुनो। परब्रह्म सनातन और आनंद स्वरूप हैं, वे नित्यकाल रस स्वरूप और रस के आधार हैं। वे परात्पर, अद्वितीय, अनंत और असीम हैं। फिर भी वे स्वयं शक्ति और शक्तिमान दोनों रूपों में विद्यमान हैं, और लीला रस की चरम सीमा तथा आश्रय स्वरूप भी वे ही हैं। तर्क कभी उस तत्त्व को छू भी नहीं सकता, वह अति गंभीर रस तत्त्व केवल समाधि की शरण में ही अनुभव होता है।
आह! उस समाधि में कैसा महान धन मिलता है! हे साधक, समाधि में स्थिर होकर शांत हृदय से देखो। वह रस-तत्त्व अखंड आनंद है, फिर भी उसमें आस्वादक और आस्वाद्य का भेद है। यही उस अद्वितीय प्रभु का नित्य स्वभाव है। आस्वादक रूप में वे कृष्ण हैं, और आस्वाद्य रूप में राधिका हैं। इस द्वैत में कैसा आनंद है! उनका परम आनंद-धाम वृन्दावन है, जिसे योगमाया इस भौतिक जगत में भी विशेष रूप से प्रकट करती है। उसी की शरण में साधकगण नित्य प्रेम-तत्त्व पाते हैं। वैकुंठ में भी जिसका नाम मंगलमय है, वह वृन्दावन ही है। हे जीव! यदि तुम नित्य आनंद की धारा की सेवा करना चाहते हो, तो सदा गुरु के चरणों की शरण लो। ब्रह्म-चिन्तन आदि सारी नीरस उपासना छोड़कर, फूलों से भरे वृन्दावन के श्री रास-मंडल में सदा प्रेम की साधना करो। 'मैं पुरुष हूँ', यह अहंकार बहुत दुर्बल है। हे शुद्ध जीव! तुम तो कृष्ण के आस्वाद्य हो, उनके अपने जन हो, श्री राधिका की नित्य सखी हो। उस परमानंद रस का अनुभव करो। माया का भोग ही तुम्हारा पतन है।