भाबना भाबना मन तुमि अति दुष्ट
सोचो! सोचो, हे मन! तुम बहुत दुष्ट हो। (तुम विषय-सुखों का विष पीते हो।) तुम काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद आदि से घिरे हुए हो। (तुम अपने ही शत्रुओं के वश में हो।)
तुम इन्द्रिय-सुख, निर्विशेष मुक्ति और व्यर्थ गपशप की प्यास से आकर्षित होते हो। (तुम्हें व्यर्थ गपशप बहुत भली लगती है।) कुटिल चालबाज़ी, छल-कपट, यश की लालसा आदि तुम्हें चूर-चूर कर देते हैं। (तुम सच्चे नहीं हो।) हे मेरे भाई, ये सब विपत्तियाँ अब तुम्हें घेरे हुए हैं। (ये सब तुम्हारे ही शत्रु हैं।)
यदि तुम इन सबको नहीं छोड़ोगे, तो श्री श्री राधा कृष्ण को कैसे प्राप्त करोगे? (प्रयत्न करके इन्हें छोड़ो! छोड़ो!) साधु-संग के बिना तुम अपना अभीष्ट कैसे प्राप्त करोगे? (साधु-संग करो! साधु-संग करो!) वैष्णवों के चरणों में डूब जाओ। तब तुम्हारे सारे अनिष्ट मिट जाएँगे। (एक बार इस पर विचार करो। इसे देखो।)