अपराध फले मम चित्त भेलो बज्र सम
हे हरि! अपराधों के फल से मेरा हृदय वज्र के समान कठोर हो गया, और मुझे आपके नाम में कोई भाव नहीं मिला। निराश होकर मैं ऊँचे स्वर से आपका नाम लेकर बड़े दुःख से बार-बार पुकार रहा हूँ।
हे दीनों पर दयालु, करुणा के आगार प्रभु! मेरे प्राण बचा लीजिए, इस भव-सागर से मुझे उबार लीजिए।
आपका नाम लेते हुए कब मेरी आँखों से झर-झर आँसू बहेंगे?
मेरे कंठ में कब गद्गद स्वर उठेगा, और मुख से अधूरे शब्द निकलेंगे?
मेरे शरीर पर कब रोमांच होगा, और स्वेद, कम्पन तथा स्तम्भ बार-बार प्रकट होंगे?
कब मेरा शरीर पीला पड़ जाएगा और मैं बेसुध हो जाऊँगा, फिर भी आपके नाम की शरण में ही अपने प्राण टिकाए रखूँगा?
मूढ़ भक्तिविनोद रोते हुए कहते हैं: 'हे प्रभु! वह दिन मुझे कब मिलेगा?'
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
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- भाव
- पद
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