गौराङ्ग रसेर नदी प्रेमेर तरङ्ग
प्रभु गौरांग से अमृत की एक विशाल नदी बहती है। उस नदी की लहरें प्रेम की लहरें हैं। उमड़ती हुई वह नदी कभी बहना बन्द नहीं करती।
अभिराम ठाकुर और सारंग ठाकुर उस नदी के दो किनारे हैं। अच्युतानन्द उसमें प्रेम का भँवर हैं।
श्रीअद्वैतचन्द्र उस नदी की धारा हैं। प्रभु नित्यानन्द उस नदी में तैरने वाले गोताखोर भी हैं और उसके जल में चलने वाली नाव के कर्णधार भी।
श्रीवास ठाकुर और उनके साथी प्रेम के उस जल में तैरने वाली मछलियाँ हैं। स्वरूप दामोदर और श्रीरूप गोस्वामी उस नदी पर चमकती प्रेम की धूप की किरणें हैं।
हाय, उस नदी में तैर न पाने के कारण दुःखी शेखर दास किनारे पर ही रहकर ज़ोर-ज़ोर से रोता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- शेखर दास
- पद
- 5