हाटेर पत्तन श्री शचीनन्दन
शचीनन्दन ने प्रसन्न होकर इस हाट (बाज़ार) की स्थापना की। सुन्दर प्रभु निताई, हाट के स्वामी, ने हर जीव के दुःखों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
देखो, यह कितना सुन्दर हाट है! यहाँ नरहरि दास कोषाध्यक्ष (विश्वासपात्र) हैं। श्रीनिवास आचार्य उनके साथी हैं।
अद्भुत प्रभु अद्वैत इस हाट के मुंशी (सचिव) हैं। हरिदास, रामानन्द, सत्यराज और अन्य लोग फेरीवाले हैं जो हाट में घूमते रहते हैं।
कितने ही करताल, मृदंग, ढोल और दूसरे वाद्य बज रहे हैं! हाट में मधुर संगीत भर गया है। गाना और नाचना हो रहा है और बार-बार ऊँचे स्वर में “हरिबोल!” की पुकार उठ रही है।
गदाधर प्रेम का अपना माल सजाते हैं। उनके साथी, दूसरे व्यापारी, ये हैं: रामानन्द राय, मुरारि, मुकुन्द, वासुदेव, सुलोचन, सनातन गोस्वामी, रूप गोस्वामी, पण्डित स्वरूप दामोदर, रामानन्द वसु, शिवानन्द सेन, सन्त वक्रेश्वर, शंकर पण्डित, काशीश्वर, मुकुन्द, माधव दास, रघुनाथ दास और बहुत से अन्य। वे सब परम गुणवान हैं। वे मन की आशा पूरी करते हैं।
मैं कितने नाम लिखूँ? ये सब व्यापारी अपना माल फैलाए बैठे हैं। वे तरह-तरह के आभूषण फैलाते हैं, जैसे अश्रु बहाना, शरीर के रोंगटे खड़े हो जाना और प्रेम के दूसरे लक्षण।
हाट में दुकानों से माल बेचने वाले व्यापारी हैं और नाचने वाले भक्त भी हैं। दीनता का मूल्य चुकाकर ग्राहक प्रेम का माल खरीदते हैं। यह खरीद और बिक्री बिना रुके चलती रहती है।
ठाकुर गोपाल इस हाट के कोतवाल (रखवाले) हैं। गोपीनाथ कर वसूलने वाले हैं। श्री रघुनन्दन हाट की देखभाल करने वाले हैं। वे हाट को सुन्दर बनाए रखते हैं।
यहाँ दिन और रात का कोई अन्तर नहीं है। यह बाज़ार सदा खुला रहता है। यहाँ ग्राहक सदा आते हैं और प्रेम का माल खरीदते हैं। शचीमाता के प्यारे पुत्र स्वयं प्रेम का माल फैलाते हैं।
इस हाट में सारे कष्ट टूटकर बिखर जाते हैं। कंगाल भिखारी भी आनन्दित हैं। वे खाकर अपना पेट भर लेते हैं। इस हाट को देखकर यमराज सोच में पड़ जाते हैं। वे विनम्रता से सिर झुका लेते हैं।
इस हाट में न बुढ़ापा है, न मृत्यु। इस हाट में दिव्य आनन्द सदा प्रकट रहता है। यहाँ न शोक है, न भय। इस हाट में भिखारी शेखर राय झुककर कुछ भोजन माँगता है और खा लेता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- शेखर दास
- पद
- 13