जगन्नाथ मिश्रेर सुकृति बीज हैते
नदिया में जगन्नाथ मिश्र के पूर्व पुण्यकर्मों के बीज से गौर रूपी कल्पवृक्ष उत्पन्न हुआ।
माली निताई ने आकर उस वृक्ष की यत्नपूर्वक सेवा की। उस वृक्ष से अनेक शाखाएँ और उपशाखाएँ निकलीं।
उस वृक्ष में बहुत से अद्भुत प्रेम-फल लगे, जो रस से भरे थे और केवल मतवाला कर देने वाले थे।
माली निताई ने आनन्द से वे फल तोड़े। उन्होंने दोनों हाथों से वे फल दीन और दुःखी जनों को बाँटे।
उन फलों का रस चन्द्रमा के मीठे अमृत के समान था। जो भी उस फल का रस चूसकर खाता, उसकी भूख दूर भाग जाती।
फिर माली निताई ने स्वयं एक फल खाया। आनन्द में मतवाले होकर वे नाचने लगे। फिर उन्होंने फलों को डलिया में रखकर डलिया सिर पर सन्तुलित कर ली।
“लो! लो! कृपा करके लो!” कहते हुए उन्होंने सबको वे फल बाँटे। केवल शेखर राय को उनमें से कोई फल नहीं मिला। केवल वही ठगा रह गया।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- शेखर दास
- पद
- 7