गोविन्द गोपीनाथ! कृपा करि राख निजपदे
हे गोविन्द! हे गोपियों के प्रियतम गोपीनाथ! कृपा करके मुझे अपने चरणों में रखो। काम, क्रोध आदि छह शत्रु मुझे लेकर विभिन्न स्थानों में भटकाते हैं, और अनेक प्रकार से मुझे विषय-भोग में लगा देते हैं।
माया का दास बनकर मैंने अनेक इच्छाएँ कर ली हैं, इससे तुम्हारा स्मरण मुझसे दूर हो गया है। धन पाने की इस लालसा में, कपटी वैष्णव का वेश धरकर, मैं घर-घर भटकता रहता हूँ।
बहुत दुःख सहने के बाद तुम कृपा की रस्सी से मेरा गला बाँधकर मुझे व्रज में ले गए थे। परन्तु दैवी माया ने ज़बरदस्ती वह रस्सी खोल दी, और मुझे फिर संसार के कुएँ में डाल दिया।
यदि तुम फिर से कृपा करके इस जन के बाल पकड़कर इसे व्रजधाम में खींच लो, तभी मेरा भला है, नहीं तो मेरे प्राण चले जाएँगे। दीन दास नरोत्तम यही कहते हैं।