हरि हरि ! कबे हब वृन्दावन वासी
हे हरि! हे हरि! कब मैं वृन्दावन का निवासी बनूँगा, और अपनी आँखों से दिव्य युगल की अपार सुंदरता का दर्शन करूँगा?
सुंदर सेज पर सोने के सुख को त्यागकर, कब मेरा शरीर व्रज की धूल से धूसरित होगा?
सांसारिक स्वादिष्ट भोजन को दूर त्यागकर, कब मैं व्रज में भिक्षा माँगकर खाऊँगा?
वन-वन घूमते हुए कब मैं व्रज की परिक्रमा करूँगा? और थककर कब यमुना के तट पर विश्राम करूँगा?
शीतल वंशीवट में कब मैं दिन की गर्मी से राहत पाऊँगा? कब कुंज में बैठकर वैष्णवों के समीप रहूँगा?
नरोत्तम दास सब कुछ त्यागकर कहते हैं: 'मुझे ऐसी दशा कब प्राप्त होगी?'
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरोत्तम दास ठाकुर · जीवनी पढ़ें
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- प्रार्थना
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- पद
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