जोग जाग सब छार श्रद्धा सकलेर सार
योग और यज्ञ सब राख के ढेर हैं, श्रद्धा ही सबका सार है। जिसके हृदय में यह श्रद्धा उदय होती है, उसे पहले भक्ति-रस के सागर की एक बूँद मिलती है, फिर क्रमशः वह उस पूरे भक्ति-रस-सागर में प्रवेश का अधिकारी बन जाता है।
कर्म और ज्ञान से बड़े प्रयास करके देवी-देवताओं की सेवा करने पर भी तुच्छ फल और तुच्छ निर्विशेष विचार ही हाथ लगते हैं। परन्तु साधुजनों की संगति में रहकर कृष्ण-कथा सुनने से भगवान् में दृढ़ विश्वास जागृत होता है।
हे भाइयों! यही सच्ची श्रद्धा है, इसी श्रद्धा का मैं सदा गान करता हूँ। यह श्रद्धा ही भक्ति-लता का बीज है। कर्मी और ज्ञानी बार-बार जिसे श्रद्धा कहते हैं, वह भाव सच्ची श्रद्धा नहीं हो सकता।
जब मैं उन्हें पवित्र नाम की महिमा पर विवाद करते सुनता हूँ, तो मेरे अंग जलने लगते हैं। यदि तुम लोहे को सोना कह दो, तो भी लोहा लोहा ही रहेगा। जब तक उसे चिन्तामणि का स्पर्श न मिले, वह कभी सोना नहीं बन सकता।
कृष्ण-भक्ति ही वह चिन्तामणि है। उसके स्पर्श से कर्म और ज्ञान में लगी हुई श्रद्धा का लोहा, भक्ति में श्रद्धा के सोने में बदल जाता है। यह शक्ति केवल भक्ति के इस चिन्तामणि में ही है।