कबे कृष्ण धन पाब
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3 रिकॉर्डिंगकब मैं कृष्ण-धन को पाऊँगी, उसे अपने हृदय के बीच रखूँगी, और अपने तपते प्राणों को शीतल करूँगी? कब मैं अपना हृदय सजाकर उसमें अपने प्राणप्रिय को बिठाऊँगी, और उनका चन्द्रमुख निहारूँगी?
हे सखी! मेरा वह शुभ दिन कब आएगा? कब मैं अपने प्राणनाथ के संग आनन्दपूर्वक यमुना के सुखद तट पर लौटूँगी?
कब मैं ललिता और विशाखा को साथ लेकर, तरह-तरह के उपहार सजाकर, उनसे मिलने जाऊँगी? कब विधाता दया करके मुझे उन गुणों के सागर कृष्ण से मिलाएँगे? कब मेरा ऐसा सौभाग्य होगा?
क्रूर विधि के खेल ने प्रेम का यह बाज़ार उजाड़ दिया, उसमें तिल-मात्र भी शेष नहीं रहा। नरोत्तम दास कहते हैं, मेरे जीवन में अब कैसी आशा बचे? व्रजेन्द्र-कुमार मुझे छोड़कर चले गए।
ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री, इस्कॉन भक्त। सभी भक्त गायकों की जय।