कदम्ब तरुर डाल नामियाछे भूमे भाल
कदम्ब वृक्ष की शाखा झुककर भूमि पर मस्तक टेक रही है, फूल एक के बाद एक खिल रहे हैं। सारा वृन्दावन सुगन्ध से भर गया है, और भ्रमर-भ्रमरी उसमें क्रीड़ा कर रहे हैं।
राधा और कृष्ण आनंद से विहार करते हैं। उनका रूप और लावण्य कैसा अद्भुत है! वे चतुराई की खान हैं, और उनके अंगों पर रत्नों के आभूषण सजे हैं।
प्रिय गिरिधारी राधारानी का दाहिना हाथ पकड़कर, दोनों मधुर-मधुर चाल से चलते हैं। सखियाँ आगे-पीछे उन पर फूल बरसा रही हैं, और एक सखी उन पर चामर डुला रही है।
वह स्थान पराग से धूसर है और चन्द्रमा की किरणों से बहुत शीतल है। वहाँ रत्नों की वेदी पर राधा और कृष्ण हाथ में हाथ डालकर घूम-घूमकर नाचते हैं, और एक-दूसरे के स्पर्श से उनके शरीर पुलकित हो उठते हैं।
सखियाँ हाथों में कस्तूरी और चन्दन लेकर उन्हें सजाती हैं, और सुगन्धित फूल बरसाती हैं। पसीने की बूँद-बूँद से उनका चन्द्रमुख और सुन्दर लग रहा है, और उनके अधरों पर बाँसुरी कैसी मधुर बज रही है!
उनके हास-परिहास के रस और सरल, मधुर बातों से नरोत्तम की मनोकामना पूरी होती है। दोनों ने विचित्र वेश धारण किया है, केशों में फूल सजे हैं, और वे आँखों को मोह लेने वाली लीला करते हैं।