केनो मन कामेरे नचाओ प्रेम प्राय
हे मन, तू काम को प्रेम जैसा बनाकर क्यों नचाता है? चमड़े और मांस से बना यह काम निरन्तर जड़ सुख ही चाहता है, और सदा जड़ विषयों के पीछे दौड़ता है।
जीव का स्वरूप ही आध्यात्मिक है, और उस चिद्-स्वरूप में प्रेम का सार छिपा है, जिसका एकमात्र विषय भगवान हरि हैं। हाय, काम के आवरण से ढँककर वह प्रेम अभी सोया हुआ-सा है। काम को दूर भगाकर उस प्रेम को जगा।
श्रद्धा से साधु-संग होता है, और भजन की क्रियाओं में आनन्द से लगने पर निष्ठा, रुचि और आसक्ति का उदय होता है। आसक्ति से भाव होता है, और उस भाव में प्रेम प्रकट होता है। इसी क्रम से प्रेम उत्पन्न होता है।
जो इस मार्ग में प्रयास करता है, वही सच्चे प्रेम को प्राप्त करता है। इन चरणों को छोड़ देने से प्रेम कभी नहीं जागता। हे दुष्ट मन, तू इस साधन-क्रम से क्यों डरता है? काम से कभी प्रेम उत्पन्न नहीं हो सकता।
किसी अभिनेता के स्वांग की भाँति, तेरा यह छद्म 'प्रेम' केवल दिखावा है, इसमें केवल इन्द्रिय-तृप्ति ही है। इन्द्रिय-भोग व्यर्थ राख के समान है, इसे सदा त्याग दे। हे भाई, इन अपराधों को भी त्याग दे।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- कल्याण-कल्पतरु
- भाव
- पद
- 5