लाख बाण कनक कषिल कलेबर
उनका रूप लाखों बार शुद्ध किए गए सोने से भी अधिक तेजस्वी है। वे स्वर्णमय सुमेरु पर्वत से भी अधिक मनोहर हैं। वे रुँधे गले से टूटे-फूटे शब्द बोलते हैं। उनकी आँखों से आँसू बहते हैं। वे स्थिर नहीं रह पाते। वे लोकों को मोहित कर देते हैं। उनकी आँखें किसकी खोज में हैं?
देखो, माता शची के सुन्दर पुत्र को! उनकी सुन्दर भुजाएँ घुटनों तक पहुँचती हैं।
वे मदमस्त, सुन्दर हाथी की तरह चलते हैं। उनके गौर शरीर पर मालती के फूलों की माला इधर-उधर झूलती है।
उनका सुन्दर मुख शरद ऋतु के चन्द्रमा को भी हरा देता है। आँसुओं का रूप धरकर दिव्य आनन्द और प्रेम उनकी आँखों को भर देता है।
डगमगाते हुए वे दो-चार कदम चलते हैं। अस्थिर होकर प्रभु गिर पड़ते हैं।
गोविन्द दास कहते हैं: मैं भगवान गौर पर सहर्ष सब कुछ न्योछावर करता हूँ। मैं उनके अनुयायियों का अनुयायी हूँ।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास
- पद
- 6