चित चोर गौर अङ्ग रङ्गे फिरत भकत सङ्ग
भगवान गौर के अंग हृदय को चुरा लेते हैं। भक्तों से घिरे हुए वे नृत्य-मण्डल में घूमते हैं। वे कामदेव से भी अधिक मनोहर हैं। उनका शरीर सोने की चमक को हरा देता है। उनके शरीर के रोएँ खड़े हैं। वे गौर वर्ण और तरुण हैं। वे इस जगत् के एकमात्र मित्र हैं, उस जगत् के जो अनेक कष्टों की ज्वाला में जल रहा है।
दिन-रात वे दिव्य प्रेम से विभोर रहते हैं। कदम्ब के केसरों की तरह उनके शरीर के रोएँ खड़े हैं। उनका मुख शरद ऋतु के चन्द्रमा की तरह शोभायमान है। एक क्षण वे रोते हैं। अगले क्षण हँसते हैं। फिर अगले क्षण उनके मुख से कड़वे शब्द निकलते हैं। वे गहन दिव्य प्रेम के सागर में तैरते हैं।
उनके मधुर वचन अमृत को भी हरा देते हैं। जब वे धीरे-धीरे चलते हैं, तब उनके लाल चरणों की पायलें बार-बार बोल उठती हैं। वे पूरे जगत् को दिव्य प्रेम में तैरा देते हैं। गोविन्द दास उस प्रेम-सागर की एक बूँद चखने की आशा करता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास
- पद
- 3