जम्बुनद तनु बदन अम्बुज
उनका शरीर सोने का है। उनका मुख कमल का फूल है। वे ऊँचे स्वर में “हरि! हरि!” का उच्चारण करते हैं। उनके कमल-नयनों से आँसुओं की स्वर्गीय गंगा उनकी शंख जैसी गर्दन पर बहती है।
देखो! देखो, भगवान गौर को, जो ब्राह्मणों के राजा हैं! अपने साथियों से घिरे हुए वे नवद्वीप के शिखर पर खड़े हैं।
नित्य नवीन दिव्य प्रेम से भरे हुए वे दिन-रात चंचल, लाल-लाल चरणों से नृत्य करते हैं। उनकी करुणामयी आँखों के आँसुओं के गहरे काले जल से इस पृथ्वी में बाढ़ आ जाती है।
कभी वे नाचते हैं। कभी गाते हैं। कभी रुँधे गले से टूटे-फूटे शब्द बोलते हैं। संसार के हर मनुष्य को उन्होंने दिव्य प्रेम की बाढ़ में डुबो दिया है। केवल गोविन्द दास नहीं डूबा। केवल वही ठगा गया।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास
- पद
- 4