आजु शची नन्दन नब अभिषेक
नेत्रों को इस दर्शन से भरकर शची के पुत्र का अभिषेक देखिए, वह अभिषेक जो समस्त आनन्द का मूल है।
नित्यानन्द और अद्वैत आकर भगवान गौर की महिमा गाते हैं। भक्त आनन्द में मतवाले हैं।
भक्त भगवान गौर के अनुपम स्वर्णिम रूप को निहारते हैं। उनके नेत्र बादल बन जाते हैं, जो प्रेम के आँसुओं की मूसलाधार वर्षा करते हैं।
बार-बार वे भगवान गौर के मुख-चन्द्र को निहारते हैं, ऐसा चन्द्रमा जो दिव्य प्रेम के अमृत-रस के सागर में ऊँची ज्वार की लहरें उठा देता है।
प्रेम की वे लहरें अब सारे लोकों में भर गई हैं। केवल गोविन्द दास ही उनसे अछूता है। केवल वही ठगा गया है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास
- पद
- 5