चम्पक शोण कुसुम कनकाचल
अहा! भगवान गौर का सुन्दर, शोभामय रूप पीले चम्पक के फूल और स्वर्ण-पर्वत को भी हरा देता है। उनकी लम्बी गर्दन की शोभा का कोई अन्त नहीं। उनकी मनोहर भंगिमाएँ संसार के हृदयों को मोह लेती हैं।
शची के पुत्र की जय हो! तीनों लोक उनकी वन्दना करते हैं। वे काले कलियुग-रूपी साँप के सारे भय को टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं।
उनके शरीर के रोएँ खड़े हैं। उनका हृदय दिव्य प्रेम से भर गया है। वे धीरे-धीरे मुस्कुराते हैं। वे रुँधे गले से टूटे-फूटे शब्द बोलते हैं। आँसुओं की कितनी ही स्वर्गीय गंगाएँ उनकी आँखों से बहती हैं?
जो व्यक्ति वास्तव में उनका अपना ही स्वरूप है, उसके प्रति प्रेम के अमृत का आस्वादन करते हुए वे नाचते हैं। आनन्द से विभोर होकर उनकी पलकें बन्द होने लगती हैं। कितने ही भक्त वहाँ इकट्ठे होकर गाते हैं? भाव में विवश होकर पृथ्वी-मण्डल का हर निवासी अब दिव्य प्रेम के अमृत में तैर रहा है। केवल गोविन्द दास उस अमृत को छू नहीं पाता।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास
- पद
- 4