Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi
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टेक्स्ट
मन, केनो ए संशोय जोड प्रति घृणा कोरि' भजिते प्रेमेर होरि स्वरूप लखिते कोरो भोय
अर्थ

हे मन, तुझे यह संशय क्यों है? तू भौतिक जगत् से घृणा करता है, फिर प्रेमपूर्वक भगवान हरि की भक्ति करने में क्यों संकोच करता है? तू भगवान के स्वरूप का चिंतन करने से भी डरता है।

स्वरूप कोरिते ध्यान पछे जोड पाय स्थान एइ भोये भबा' भ्रम-मोय निराकार निरञ्जन सर्ब-ब्यापी सनातन अस्वरूप कोरिछो निश्चोय
अर्थ

तू सोचता है कि किसी स्वरूप का ध्यान करने से तू पुनः इस भौतिक जगत् में उलझ जाएगा। इस भय के वशीभूत हो तू निराकार ब्रह्म का चिंतन करता है। तुझे यह दृढ़ विश्वास है कि परमेश्वर निराकार, निर्गुण, सर्वव्यापी, सनातन और स्वरूपरहित है।

अभाब-धर्मेर बशे स्वभाब ना चित्त पशे भाबेर अभाब तहे होय त्यज एइ तर्क-पाश परानन्द-परकाश कृष्णचन्द्र कोरोहो आश्रोय
अर्थ

हे मन, इस भ्रम के वशीभूत होकर तू भगवान के वास्तविक स्वरूप को नहीं समझता। जो सत्य है उसे तू भ्रम मानता है। इस मिथ्या तर्क के जाल को काट दे और परमानन्दस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्र की शरण ग्रहण कर।

सच्-चिद्-आनन्द-मोय कृष्णेर स्वरूप होय सर्बानन्द-माधुर्य निलोय सर्बत्र सम्पूर्ण-रूप एइ एक अपरूप सर्ब-ब्यापी ब्रह्मे ताहा नोय
अर्थ

भगवान कृष्ण का स्वरूप सत्, चित् और आनन्द से पूर्ण तथा नित्य है। वह सम्पूर्ण आनन्द और मधुरता का धाम है। यह अद्भुत, पूर्ण स्वरूप सर्वत्र एक ही है, परन्तु सर्वव्यापी निर्विशेष ब्रह्म में यह विशेषता नहीं है।

अत एव ब्रह्म ता'र अङ्ग-कान्ति सु-बिस्तार ब्र्हत् बोलिया तँरे कोय ब्रह्म पर-ब्रह्म जेइ श्री-कृष्ण-स्वरूप सेइ बिनोदेर जाहाते प्रणोय
अर्थ

इसीलिए ब्रह्म तो कृष्ण के अंगों की दूर-दूर तक फैली कान्ति है, और विशाल होने के कारण उसे 'बृहत्' कहा जाता है। जिसे ब्रह्म या परब्रह्म कहते हैं, वह श्रीकृष्ण का ही स्वरूप है। उसी स्वरूप से भक्तिविनोद को प्रेम है।