मन, केनो ए संशोय
हे मन, तुझे यह संशय क्यों है? तू भौतिक जगत् से घृणा करता है, फिर प्रेमपूर्वक भगवान हरि की भक्ति करने में क्यों संकोच करता है? तू भगवान के स्वरूप का चिंतन करने से भी डरता है।
तू सोचता है कि किसी स्वरूप का ध्यान करने से तू पुनः इस भौतिक जगत् में उलझ जाएगा। इस भय के वशीभूत हो तू निराकार ब्रह्म का चिंतन करता है। तुझे यह दृढ़ विश्वास है कि परमेश्वर निराकार, निर्गुण, सर्वव्यापी, सनातन और स्वरूपरहित है।
हे मन, इस भ्रम के वशीभूत होकर तू भगवान के वास्तविक स्वरूप को नहीं समझता। जो सत्य है उसे तू भ्रम मानता है। इस मिथ्या तर्क के जाल को काट दे और परमानन्दस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्र की शरण ग्रहण कर।
भगवान कृष्ण का स्वरूप सत्, चित् और आनन्द से पूर्ण तथा नित्य है। वह सम्पूर्ण आनन्द और मधुरता का धाम है। यह अद्भुत, पूर्ण स्वरूप सर्वत्र एक ही है, परन्तु सर्वव्यापी निर्विशेष ब्रह्म में यह विशेषता नहीं है।
इसीलिए ब्रह्म तो कृष्ण के अंगों की दूर-दूर तक फैली कान्ति है, और विशाल होने के कारण उसे 'बृहत्' कहा जाता है। जिसे ब्रह्म या परब्रह्म कहते हैं, वह श्रीकृष्ण का ही स्वरूप है। उसी स्वरूप से भक्तिविनोद को प्रेम है।