मन रे धन मद नितान्त असार
हे मन, धन का यह मद सर्वथा व्यर्थ है। धन, सेवक और सम्पत्ति, जो कुछ भी है, वह सब इस शरीर के ही अनुगामी हैं। जब शरीर नहीं रहेगा, तब यह सब कुछ राख हो जाएगा।
विद्या के चाहे कितने भी प्रयास हों, वैद्य चाहे कितनी भी सलाह दे, कोई भी इस शरीर की रक्षा नहीं कर सकता। जब श्वास रुक जाती है, तब केवल यह देह ही शेष रहती है, और आत्मा उस खाली कोष में नहीं ठहरती।
यदि धन से आयु मिलती, तो धनवान राजा कभी न मरते। यदि धन से अमरता मिलती, तो रावण भी अमर हो जाता। परन्तु धन शरीर की रक्षा नहीं कर सकता, शरीर के जाने पर कोई भी उसे नहीं बचा सकता। इसलिए धन से क्या लाभ?
यदि तेरे पास बहुत धन है, तो उसे अपने लिए मत रख, स्वयं अकिंचन बनकर वैष्णवों की सेवा में लगा दे। सब जीवों पर निरन्तर दया कर, सदा राधा-कृष्ण की आराधना कर, और सदाचारी बनकर रह।