Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi
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टेक्स्ट
मन रे धन-मद नितान्त असार धन जन बित्त जत ए देहेर अनुगत देहो गेले से सकल छार
अर्थ

हे मन, धन का यह मद सर्वथा व्यर्थ है। धन, सेवक और सम्पत्ति, जो कुछ भी है, वह सब इस शरीर के ही अनुगामी हैं। जब शरीर नहीं रहेगा, तब यह सब कुछ राख हो जाएगा।

बिद्यार जतेक चेष्टा चिकित्सक उपदेष्टा केहो देहो राखिबारे नारे अजपा होइले शेष देह-मात्र अबशेष जीब नाहि थाकेन आधारे
अर्थ

विद्या के चाहे कितने भी प्रयास हों, वैद्य चाहे कितनी भी सलाह दे, कोई भी इस शरीर की रक्षा नहीं कर सकता। जब श्वास रुक जाती है, तब केवल यह देह ही शेष रहती है, और आत्मा उस खाली कोष में नहीं ठहरती।

धने जदि प्राण दित धनि राजा ना मरित धरामर होइतो राबण धने नाहि राखे देहो देहो गेले नाहे केहो अत एब कि कोरिबे धन
अर्थ

यदि धन से आयु मिलती, तो धनवान राजा कभी न मरते। यदि धन से अमरता मिलती, तो रावण भी अमर हो जाता। परन्तु धन शरीर की रक्षा नहीं कर सकता, शरीर के जाने पर कोई भी उसे नहीं बचा सकता। इसलिए धन से क्या लाभ?

जदि थाके बहु धन निजे हो'बे अकिञ्चन बैष्णबेर कोरो उपकार जीबे दोया अनुखण राधा-कृष्ण-अराधन कोरो सदा हो'ये सदाचार
अर्थ

यदि तेरे पास बहुत धन है, तो उसे अपने लिए मत रख, स्वयं अकिंचन बनकर वैष्णवों की सेवा में लगा दे। सब जीवों पर निरन्तर दया कर, सदा राधा-कृष्ण की आराधना कर, और सदाचारी बनकर रह।