मन रे, केनो आर बर्ण अभिमान
हे मन, तुझे अपनी जाति का इतना अभिमान क्यों है? जब कोई पापी मरता है, तो यमदूत उसे पकड़कर ले जाते हैं, और उसके उच्च कुल का कोई सम्मान नहीं करते।
यदि वे शुभ कर्म करें, तो ब्राह्मण और चाण्डाल दोनों समान रूप से स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं। यदि अशुभ कर्म करें, तो दोनों ही समान रूप से नरक में दण्ड पाते हैं। भविष्य के जन्मों में भी दोनों के लिए एक ही नियम लागू होता है।
तो फिर तू इस तुच्छ जाति-अभिमान को लेकर क्यों घूमता है? यदि मृत्युपर्यन्त तू अपनी उच्च जाति का अभिमान करता रहे और दूसरी जातियों से घृणा करता रहे, तो तू स्वयं नरक को ही आमंत्रित करता है।
हे भाई, ब्राह्मण होकर तू समाज में मिलने वाला सम्मान स्वीकार कर सकता है, परन्तु किसी वैष्णव का अनादर मत कर। जैसे एक छोटा व्यापारी बड़े जहाजों के स्वामी बड़े व्यापारी का सम्मान करता है और उससे विवाद नहीं करता, वैसे ही बुद्धिमान व्यक्ति कभी वैष्णव से विवाद नहीं करता।
इसलिए यदि तू अपनी शक्ति के अनुसार श्रीकृष्ण की भक्ति करे, तो यह सोने पर सुहागा होगा। तेरा जनेऊ सार्थक हो जाएगा, और इस लोक तथा परलोक में तुझे सब लाभ मिलेंगे। तब भक्तिविनोद तेरी स्तुति गाएगा।