मन रे, केनो कोरो बिद्यार गौरब
हे मन, तू भौतिक विद्या का इतना गौरव क्यों करता है? स्मृति-शास्त्र, व्याकरण और अनेक भाषाओं का अध्ययन तो केवल तेरी यश-सुगन्ध ही बढ़ाता है।
परन्तु देख, विचार कर: यदि तू भगवान हरि की भक्ति न करे, तो यह विद्या तुझे नरक तक ही ले जाएगी। श्रीकृष्ण के प्रति अनुराग ही वह बीज है जिससे भक्ति का जन्म होता है, केवल विद्या से यह सम्भव नहीं है।
मैंने देखा है कि नुक्ताचीनी करने वाली शुष्क विद्या संसार को हानि ही पहुँचाती है। परन्तु जिस विद्या के चिन्तन से हृदय में श्रीकृष्ण के प्रति प्रीति जागृत होती है, वह विद्या सबको प्रिय होती है।
जो विद्या भक्ति के मार्ग में बाधा बने, उसके सिर पर निःसंकोच लात मार। देवी सरस्वती स्वयं श्रीकृष्ण को अत्यन्त प्रिय हैं, और श्रीकृष्ण-भक्ति ही उनके हृदय का धन है। यही भक्ति भक्तिविनोद का भी वैभव है।