Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

मन रे, केनो कोरो बिद्यार गौरब

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मन रे, केनो कोरो बिद्यार गौरब स्मृति-शास्त्र ब्याकरण नाना-भाषा-आलोचन बृद्धि कोरे' जशेर सौरभ
अर्थ

हे मन, तू भौतिक विद्या का इतना गौरव क्यों करता है? स्मृति-शास्त्र, व्याकरण और अनेक भाषाओं का अध्ययन तो केवल तेरी यश-सुगन्ध ही बढ़ाता है।

किन्तु देखो चिन्त कोरि' जदि ना भजिले होरि बिद्या तब केबल रौरब कृष्ण प्रति औरक्ति सेइ बीजे जन्मे भक्ति बिद्या हो'ते ताहा असम्भब
अर्थ

परन्तु देख, विचार कर: यदि तू भगवान हरि की भक्ति न करे, तो यह विद्या तुझे नरक तक ही ले जाएगी। श्रीकृष्ण के प्रति अनुराग ही वह बीज है जिससे भक्ति का जन्म होता है, केवल विद्या से यह सम्भव नहीं है।

बिद्यार मार्जन ता'र कभु कभु अपकार जगतेते कोरि अनुभब जे बिद्यार आलोचने कृष्ण-रति स्फुरे मने ताहारि आदर जानो' सब
अर्थ

मैंने देखा है कि नुक्ताचीनी करने वाली शुष्क विद्या संसार को हानि ही पहुँचाती है। परन्तु जिस विद्या के चिन्तन से हृदय में श्रीकृष्ण के प्रति प्रीति जागृत होती है, वह विद्या सबको प्रिय होती है।

भक्ति बाधा जाहा हो'ते से बिद्यार मस्तकेते पदाघात कोरो' अकैतब सरस्वती कृष्ण-प्रिया कृष्ण-भक्ति ता'र हिया बिनोदेर सेइ से बैभब
अर्थ

जो विद्या भक्ति के मार्ग में बाधा बने, उसके सिर पर निःसंकोच लात मार। देवी सरस्वती स्वयं श्रीकृष्ण को अत्यन्त प्रिय हैं, और श्रीकृष्ण-भक्ति ही उनके हृदय का धन है। यही भक्ति भक्तिविनोद का भी वैभव है।