मन तोरे बोलि ए बारता
हे मन, मैं तुझे यह बात बताता हूँ: हाय, कच्ची उम्र में तू ठगों के हाथ पड़कर ठगा गया, और तूने अपनी स्वतन्त्रता उन्हें बेच दी।
सम्प्रदाय को दोषपूर्ण मानकर, तू अब अपने आप को शुद्ध करने में जुट गया है। अब तू न तिलक लगाता है, न माला पहनता है। तूने दीक्षा की ज्वाला को भी त्याग दिया है। अब तू अपने ही नए नियम बनाता है।
अपने पूर्व मत को ठोकर मारकर, तू अपना ही नया मत प्रचारित करता है। स्वयं को अवतार मानकर, तू किसी नियम-व्रत का पालन नहीं करता। महाजनों को भ्रमित मानकर, तूने अपने पूर्व मार्ग को जल में बहा दिया।
यह सोचकर कि केवल धूर्त और चालाक लोग ही तिलक, दीक्षा और माला धारण करते हैं, तूने उनसे विरक्ति कर ली। महाजनों के मार्ग में दोष देखकर, क्रोधित होकर तूने उस मार्ग के प्रति अपना अनुराग ही त्याग दिया।
देख भाई, तूने स्वर्ण को त्यागकर राख को अपना लिया है। इस प्रकार तेरा यह लोक और परलोक दोनों नष्ट हो रहे हैं। तूने सबको छली कह दिया, परन्तु तुझे भक्ति कब मिलेगी? और मृत्यु के समय तेरे पास कौन-सा उपाय शेष रहेगा?
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- कल्याण-कल्पतरु
- भाव
- पद
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