मन, तुमि पडिले कि छार?
हे मन, तूने यह कैसी राख पढ़ी? नवद्वीप में पढ़कर तूने 'न्यायरत्न' की उपाधि तो पा ली, पर सच यह है कि तेरी सारी बातें मेंढक की टर्र-टर्र जैसी ही हैं।
तूने द्रव्य, पदार्थ, छल, निग्रहस्थान और समवाय जैसे तर्कशास्त्र के विषयों पर विचार किया। पर तूने यह नहीं सोचा कि तर्क का अंतिम फल भयानक हलाहल विष है, जिससे बचना कठिन है।
हे मन, तू अत्यन्त कठोर हो गया है। तुझमें भक्ति का बीज कैसे अंकुरित होगा? तू मुझे भव-सागर के उस पार कैसे ले जाएगा? तू तो परमेश्वर को मात्र एक कुम्हार के समान मानता है, जो चाक पर घड़ा बनाता है। ऐसी सोच से मेरा साधन-जीवन किस प्रकार सिद्ध होगा?
स्वाभाविक ध्यान को त्यागकर तू अनुमान के अभिमान की पूजा करता है। हे मन, तेरे हृदय में केवल तर्क पर ही श्रद्धा है। इसीलिए श्रीकृष्ण रूपी महान् धन इस हृदय में सुख से नहीं बैठ पाता। धिक्कार है इस तर्क को, यह तो राख का ढेर मात्र है!
इस मिथ्या तर्क को सदा के लिए दूर फेंक दे, और सर्वश्रेष्ठ श्रीकृष्णचन्द्र की भक्ति कर।