मन तुमि सन्न्यासी साजिते केनो चाओ
हे मन, तू सन्न्यासी का वेश धारण करना क्यों चाहता है? जितना अधिक बाहरी वेश हो, भीतर उतना ही बड़ा धोखा है। तू केवल अभिमान की पूजा करते हुए इस शरीर को नचा रहा है।
मेरी बात मान, अपने अन्तर को शुद्ध कर। सदा कृष्ण-अमृत का पान कर। जीवन को सहज रूप से चलने दे, ताकि भक्ति में कोई बाधा न आए। इसी का उपाय खोज।
जो कुछ सहज ही मिल जाए, उसी में सन्तुष्ट रह। दिखावे के लिए प्रयास मत कर। यदि पूरे वस्त्र न हों, तो हे भाई, कौपीन पहन ले। सर्दी में गुदड़ी ओढ़ ले।
हे भाई, अगुरु और चन्दन न हो तो मिट्टी का तिलक लगा ले। हार के बदले तुलसी-माला पहन। इस तरह कामनाओं के फंदे और सुख-भोग के बुरे विलास को घटा, और संसार की आग से छूट जा।
सन्न्यास-आश्रम का वैराग्य-विधान ही उस आश्रम का सच्चा धन है, उसमें कभी सम्मान की कामना मत कर। हे भाई, ऐसे सम्मान की चाह रखने वाले को इस संसार से मुक्ति नहीं मिलती, यह तो सदा अभिमानी व्यक्ति का लक्षण है।
तू तो चैतन्य का दास है, हरि-भक्ति ही तेरी आशा है। आश्रम के बाहरी चिह्न से क्या लाभ? प्रतिष्ठा की इच्छा को दूर फेंक दे, शान्तिपुर में निवास कर, और साधुओं की कृपा को ही अपना धन बना।
वैष्णव होने का बाहरी परिचय आवश्यक नहीं है। कभी दिखावे में मत पड़। भक्तिविनोद की यही विनती है: सदा ऊँचे स्वर में पुकार-पुकारकर राधा-कृष्ण के गुणों का गान करते रहो।