Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

मन तुमि सन्न्यासी साजिते केनो चाओ

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टेक्स्ट
मन तुमि सन्न्यासी साजिते केनो चाओ बाहिरेर साज जत अन्तरेते फाङ्कि तत दम्भ पूजि शरीर नाचाओ
अर्थ

हे मन, तू सन्न्यासी का वेश धारण करना क्यों चाहता है? जितना अधिक बाहरी वेश हो, भीतर उतना ही बड़ा धोखा है। तू केवल अभिमान की पूजा करते हुए इस शरीर को नचा रहा है।

आमार बचन धरो अन्तर बिशुद्ध कोरो कृष्णामृत सदा कोरो पान जीबन सहजे जाय भक्ति-बाधा नाहि पाय तद्-उपाय कोरोहो सन्धान
अर्थ

मेरी बात मान, अपने अन्तर को शुद्ध कर। सदा कृष्ण-अमृत का पान कर। जीवन को सहज रूप से चलने दे, ताकि भक्ति में कोई बाधा न आए। इसी का उपाय खोज।

अनायासे जाहा पाओ ताहे तुष्ट होये जाओ आडम्बरे ना कोरो प्रयास पूर्ण-बस्त्र जदि नाइ कौपीन परो हे भाइ शीत-बस्त्र कन्था बहिर्-बास
अर्थ

जो कुछ सहज ही मिल जाए, उसी में सन्तुष्ट रह। दिखावे के लिए प्रयास मत कर। यदि पूरे वस्त्र न हों, तो हे भाई, कौपीन पहन ले। सर्दी में गुदड़ी ओढ़ ले।

अगुरु चन्दन नाइ मृत्तिका-तिलक भाइ हारेर बदले धरो माला एइ रूपे आशा-पाश सुखादिर कु-बिलास खर्बि छारो सोंसारेर ज्वाला
अर्थ

हे भाई, अगुरु और चन्दन न हो तो मिट्टी का तिलक लगा ले। हार के बदले तुलसी-माला पहन। इस तरह कामनाओं के फंदे और सुख-भोग के बुरे विलास को घटा, और संसार की आग से छूट जा।

सन्न्यास-बैराग्य-बिधि सेइ आश्रमेर निधि तहे कभु ना कोरो आदर से सब आदरे भाइ सोंसारे निस्तार नाइ दाम्भिकेर लिङ्ग निरन्तर
अर्थ

सन्न्यास-आश्रम का वैराग्य-विधान ही उस आश्रम का सच्चा धन है, उसमें कभी सम्मान की कामना मत कर। हे भाई, ऐसे सम्मान की चाह रखने वाले को इस संसार से मुक्ति नहीं मिलती, यह तो सदा अभिमानी व्यक्ति का लक्षण है।

तुमि तो' चैतन्य-दास हरि-भक्ति तब आशा आश्रमेर लिङ्गे किब फल प्रतिष्ठा कोरोहो दूर बास तब शान्तिपुर साधु कृपा तोमार सम्बल
अर्थ

तू तो चैतन्य का दास है, हरि-भक्ति ही तेरी आशा है। आश्रम के बाहरी चिह्न से क्या लाभ? प्रतिष्ठा की इच्छा को दूर फेंक दे, शान्तिपुर में निवास कर, और साधुओं की कृपा को ही अपना धन बना।

बैष्णबेर परिचोय अबश्यक नाहि होय आडम्बरे कभु नाहि जाओ बिनोदेर निबेदन राधा-कृष्ण-गुण-गान फुकारि' फुकारि' सदा गाओ
अर्थ

वैष्णव होने का बाहरी परिचय आवश्यक नहीं है। कभी दिखावे में मत पड़। भक्तिविनोद की यही विनती है: सदा ऊँचे स्वर में पुकार-पुकारकर राधा-कृष्ण के गुणों का गान करते रहो।