मन तुमि तीर्थे सदा रत
हे मन, तू सदा तीर्थों में ही मन लगाए रहता है: अयोध्या, मथुरा, मायापुरी (हरिद्वार), काशी, काञ्ची, अवन्तिका, द्वारका, और भी जितने तीर्थ हैं।
मुक्ति पाने की आशा से तू इन सभी तीर्थों में बार-बार भटकना चाहता है। परन्तु हे मन, तेरा यह सारा भटकना व्यर्थ ही है, क्योंकि तीर्थ में जाने से भी तेरा चित्त स्थिर नहीं होता।
तीर्थ का सच्चा फल तो साधु-संग ही है। साधुओं की संगति में ही श्रीकृष्ण की अन्तरंग और मनोहर आराधना सम्भव होती है। जहाँ साधु हैं, वहीं वास्तविक तीर्थ है। हे मन, अपने चित्त को स्थिर कर और सदा साधु-संग में रह।
जिस तीर्थ में वैष्णव नहीं हैं, मैं वहाँ नहीं जाता। दूर देश तक चलकर जाने से क्या लाभ? जहाँ वैष्णवगण हैं, वही स्थान वृन्दावन है। वहीं असीम आनन्द है।
जहाँ श्रीकृष्ण-भक्ति होती है, वहाँ मुक्ति स्वयं दासी बनकर रहती है। वहाँ का जल मन्दाकिनी गंगा है, वहाँ के पर्वत गोवर्धन हैं, और वहाँ की भूमि वृन्दावन है। वहाँ भगवान की ह्लादिनी शक्ति स्वयं प्रकट होती है।
भक्तिविनोद कहते हैं: हे भाइयो, भटकने से मुझे क्या लाभ मिलेगा? वैष्णवों की सेवा ही मेरा व्रत है।