मृगमद चन्दन कोरे कोरि सखीगण
कस्तूरी और चन्दन हाथों में लेकर सखियाँ उन दोनों पर सुगन्धित फूल बरसाती हैं; पसीने की बूँद-बूँद कृष्ण के चन्द्र-मुख की शोभा बढ़ा रही है, अब उनके अधरों पर वंशी नहीं बज रही।
उनकी हँसी, उनका चंचल रसमय भाव, उनकी मधुर, रसीली बातें, ये नरोत्तम के मनोरथ पूर्ण करते हैं; उन दोनों की अद्भुत वेशभूषा, फूलों से सजे केश, और नेत्रों को मोह लेने वाली उनकी लीलाएँ।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरोत्तम दास ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- पद
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