नदीया नगरे गोरा चरित अमृत
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1 रिकॉर्डिंगनदिया के नगरों में हुई चैतन्य महाप्रभु की लीला का यह अमृत पान करो। इससे शोक और भय त्यागकर अपने हृदय को शान्त कर लो।
हे भाइयों! इस नाशवान संसार में कृष्ण ही एकमात्र अमृत हैं। चैतन्य महाप्रभु की शिक्षा के अनुसार सदा कृष्ण का भजन करो।
जो भाग्यवान चैतन्य महाप्रभु के चरण पकड़कर व्रज में राधा-कृष्ण का भजन करता है, वही मेरे प्राण हैं।
चैतन्य महाप्रभु राधा-कृष्ण से भिन्न नहीं हैं, और नदिया वृन्दावन से भिन्न नहीं है। इस अमृत तत्त्व को ही सार मानो, तुम्हें नित्य धन प्राप्त होगा।
मुझमें न विद्या है, न बुद्धि। मैं दीन और अकिंचन हूँ, राख का ढेर हूँ। मुझमें न ज्ञान है, न कर्म, न सदाचार।
गुरु और वैष्णवों ने मुझे भक्तिविनोद नाम दिया, परन्तु सच्ची भक्ति के बिना यह नाम अब मेरे लिए एक रोग ही बन गया है।
इस रोग को दूर करने के प्रयास में मैंने वैष्णवों के चरणों की शरण ले ली है।
वैष्णवों के चरणों की रज को अपने मस्तक पर धारण कर भक्तिविनोद यह शोक-शातन गीत गाते हैं।
ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन भक्त। सभी भक्त गायकों की जय।