Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

दण्डवत् 52

प्रावृत्-ष्री-भुषीताराण्य वृष्टि-काल-विनोद-कृत् गुहा-वनस्पति-क्रीडा सेविन् मूल-फलाषन
अर्थ

हे भगवान कृष्ण, जब वर्षा ऋतु की शोभा से वन सज उठा, तब आपने गुफाओं में और बड़े-बड़े वन-वृक्षों के नीचे लीलाएँ कीं और उनके फल तथा कन्द-मूल खाए।

पाषाण-न्यष्त-दध्य्-अन्न भुग्-वर्षाहार्षित-व्रज षाद्वलाषन-वार्ष-ष्री सम्मानक नमो `स्तु ते
अर्थ

हे भगवान कृष्ण, मैं आपको आदरपूर्वक दण्डवत् प्रणाम करता हूँ। पत्थर पर बैठकर दही और भात का अपना दोपहर का भोजन करते हुए आप और आपके ग्वाल-बाल मित्र शरद ऋतु की वर्षा से आनन्दित हैं। ताज़ी घास को पोषण देती हुई वह वर्षा अपने मनोहर सौन्दर्य के प्रकट होने से आपकी पूजा करती है।

हे षरन्-निर्मल-व्योम चारु-कान्ते प्रसीद मे षरच्-चन्द्र-लसद्-वक्त्र कृत-गोपि-महा-स्मर
अर्थ

हे भगवान कृष्ण, मुझ पर कृपा कीजिए। आपके रूप की सुन्दर कान्ति निर्मल शरद ऋतु के आकाश के समान है और आपका मुख शरद ऋतु के सुशोभित चन्द्रमा के समान है। आप गोपियों के लिए परम कामदेव बन गए हैं।

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पद
3