ओरे मन बोलि शुनो तत्त्व बिबरण
ओ मन! सुनो, मैं तुम्हें परम सत्य का वर्णन करता हूँ, जिसे भूल जाने के कारण ही जीव बंधन में पड़ता है।
वह सत्य एक है, अद्वितीय, अनुपम और असीम है। वह सत्य ही परब्रह्म है, जो सबसे श्रेष्ठ में भी श्रेष्ठ है।
वह सत्य शक्तिमान, पूर्ण और सुंदर है। शक्ति और शक्तिमान सदा एक ही तत्त्व हैं, कभी भिन्न नहीं।
उनकी नित्य शक्ति उनकी सभी नित्य लीलाओं का पोषण करती है। इन्हीं लीलाओं के लिए वृन्दावन, वैकुंठ और गोलोक प्रकट होते हैं।
लीलाओं के लिए ही भगवान के नाम, धाम, गुण और परिकर हैं। देश, काल और पात्र, ये सब उनकी शक्ति के अनुचर हैं।
इस प्रकार शक्ति के प्रभाव से भगवान की लीलाएँ प्रकट होती हैं। परब्रह्म अपनी शक्ति के साथ नित्य एक ही स्वरूप में प्रकट रहते हैं।
इसलिए जो यह सिद्धांत बनाता है कि पहले ब्रह्म है और उसके बाद शक्ति और उसका कार्य, वह इस संसार में मूर्ख है।
जब हम पूर्ण चंद्रमा कहते हैं, तो हम उसे उसकी किरणों के साथ ही जानते हैं। बिना किरणों के चंद्रमा का अस्तित्व मैं कभी नहीं मानता।
इसलिए मैं मानता और कहता हूँ कि ब्रह्म, उनकी शक्ति और उनके परिकर, सब एक साथ हैं और सब नित्य हैं।
जो परब्रह्म अखंड रूप से लीलामय हैं, वे ही अप्राकृत वृन्दावन में कृष्णचंद्र के रूप में प्रकट होते हैं।
वही अद्वय तत्त्व, परम आनंद स्वरूप, अपनी कृपा से हमारे भारतवर्ष में प्रकट हुआ।
श्री कृष्ण ही वह परम तत्त्व हैं, जो प्रकृति से परे हैं। व्रज में कृष्ण निरन्तर अपनी लीलाएँ करते हैं।
श्री कृष्ण चिन्मय धाम के सूर्य हैं। उनकी ज्योति में असंख्य चित्-कण, यानी जीव, सदा रहते हैं।
वे जीव स्वभाव से ही प्रेममय हैं, उनका प्राण कृष्ण में ही लगा रहता है। वे सदा कृष्ण की ओर आकर्षित होकर भक्ति के अमृत का पान करते हैं।
वे विभिन्न भावों से मिश्रित दास्य रस का पान करते हैं, और श्री कृष्ण के अनंत गुणों के वश में सदा रहते हैं।
कृष्ण ही माता हैं, कृष्ण ही पिता हैं, कृष्ण ही सखा और पति हैं, इन सब भिन्न भिन्न भावों में कृष्ण अपने भक्तों से प्रेम करते हैं।
वृन्दावन में कृष्ण ही एकमात्र नित्य पुरुष हैं। सभी जीव, जो स्वभाव से नारी हैं, कृष्ण के साथ लीला विहार करते हैं।
यह आनंद लीला अनंत है, इसका कभी अंत नहीं होता। इसलिए कृष्ण की लीला अखंड और अनंत है।
जिन जीवों में कृष्ण से अलग भोग की इच्छा उत्पन्न हुई, वे पुरुष भाव को धारण करके माया के जगत में प्रवेश कर गए।
यह भौतिक जगत माया की रचना है। माया भगवान की नित्य शक्ति की छाया है। वह वास्तव में कृष्ण की दासी है, और उन्हीं के आदेश का पालन करती है।
उसी माया ने मूल आदर्श (आध्यात्मिक जगत) की सारी विशेषताओं को लेकर यह दुःखों से भरा ब्रह्मांड रचा।
जब जीव कृष्ण से विमुख हो जाता है, तब माया देवी उसे अपने सुख प्रदान करती हैं।
माया के सुख में उन्मत्त होकर जीव श्री कृष्ण को भूल गया, और अज्ञान के वश में उसके भीतर मिथ्या अहंकार उत्पन्न हो गया।
अस्मिता से माया में गहरा अभिनिवेश उत्पन्न हुआ, और उससे भौतिक वस्तुओं के प्रति राग और द्वेष उत्पन्न हुए।
इस प्रकार जीव कर्म के चक्र में प्रवेश करके ऊँची और नीची योनियों में भटकता रहता है।
कहाँ वह वैकुंठ का आनंद, श्री कृष्ण की लीला, और कहाँ माया का यह सुख दुःख से भरा सर्वनाश!
चित्तत्त्व होते हुए भी जीव का माया में रमण करना अत्यंत तुच्छ और घृणित है, यह उसका अनंत पतन है।
मायिक शरीर की सेवा करते हुए, जीव अपनी वास्तविक आध्यात्मिक पहचान को भूल जाता है। हाय, यह जीव के लिए कितना बड़ा कष्ट है!
यदि इस प्रकार भटकते भटकते जीव को साधुओं का संग प्राप्त हो जाए, तो उसका छिपा हुआ नित्य स्वभाव पुनः जाग उठता है।
साधुओं के संग में कृष्ण कथा का विचार विमर्श होता है, जिससे जीव का पूर्व स्वभाव जागृत होता है और माया के बंधन कट जाते हैं।
जब जीव कृष्ण की ओर देखने लगता है, तब माया ही ज्ञान का रूप धारण करके उसके बंधनों को काट देती है।
इस मायिक जगत में विद्या-रूपी माया ही जीव की साधना के लिए नित्य वृन्दावन को प्रकट करती है।
उस वृन्दावन में जीव भाव में डूबकर, चैतन्य महाप्रभु की शरण लेकर, नित्य सेवा को प्राप्त करता है।
प्रकट लीला और गोलोक की लीला, दोनों एक ही सत्य हैं, अलग नहीं, केवल दो रूपों में प्रकट होती हैं।
नित्य लीला नित्य सेवकों का निवास स्थान है, और यह प्रकट लीला बद्ध जीवों की शरणस्थली है।
इस प्रकार वृन्दावन जीव का असली निवास है। इस असार संसार में वह नित्य तत्त्व का प्रकाश है।
हे जीव! वृन्दावन-लीला की शरण लो, जिससे आत्मा का प्रेम नित्य हो जाता है।
भौतिक प्रेम जुगनू के प्रकाश जैसा तुच्छ है। जब आत्मा के प्रेम का सूर्य उगता है, तो वह बुझ जाता है।
भौतिक प्रेम से जुड़े जितने भी शुभ अशुभ कर्म हैं, वे जीव के लिए केवल बाहरी उपाधियाँ हैं।
भौतिक प्रेम से निरंतर लौकिक भोग उत्पन्न होता है, और भौतिक प्रेम सदा ऐश्वर्य के पीछे पीछे चलता है।
भौतिक प्रेम और भौतिक शरीर दोनों जीव के स्वामी के समान बन जाते हैं, और वे जीव को मायिक विषय सुखों में नचाते रहते हैं।
वे कभी उस जीव को ब्रह्मलोक तक ले जाते हैं, और कभी उसे योग के ऐश्वर्य की शिक्षा देते हैं।
योग का ऐश्वर्य और भोग का ऐश्वर्य, ये सभी भयपूर्ण हैं। जीव के लिए निर्भयता केवल वृन्दावन में भगवत्प्रेम में ही है।
जो लोग श्री कृष्ण से विमुख होकर ऐश्वर्य की आशा रखते हैं, वे मायिक सुखों में बँधकर माया के बंधन में जा फँसते हैं।
जब जीव अकिंचन होकर आत्मा में रत हो जाता है और कृष्ण प्रेम को ही सार मानता है, तब वह भोग और मुक्ति की सारी आशाओं का त्याग कर देता है।
इस प्रकार वह संसार में जीवन की यात्रा सहज ही पूर्ण करता है, और अंत में श्री हरि उसे नित्य देह और नित्य सेवा प्रदान करते हैं।
जाति का अभिमान, बल का अभिमान, और सौंदर्य का अभिमान, इन सबका त्याग करके वह भक्ति के पथ पर तत्पर हो जाता है।
तब आश्रम आदि के विधानों में उसे राग द्वेष नहीं रहता। वह केवल कृष्ण भक्ति को ही सच्चा मार्ग मानता है।
वह सदा साधुओं के संग में रहकर, हरि लीला के रस में डूबा हुआ, अपने नित्य धर्म के पालन में अपना समय व्यतीत करता है।
जीवन यात्रा के लिए वैदिक नियमों का पालन करते हुए, वह राग द्वेष का त्याग करके उन्हें सम्मान देता है।
साधारण वैदिक धर्म धन रूपी फल देता है, और धन से भोग की प्राप्ति होती है, यह तो मूढ़ लोगों की संपत्ति है।
वह धर्म, अर्थ और काम को केवल दिन बिताने के साधन के रूप में स्वीकार करता है।
इसी से वह अपने जीवन की यात्रा चलाता है, पर उसके जीवन का सच्चा अर्थ तो कृष्ण-भक्ति की धारा है।
इसलिए साधुजन सदा बाहरी चिह्नों से रहित होकर, द्वंद्वों से परे रहकर, श्री कृष्ण का भजन करते हैं।
वे ज्ञान प्राप्ति के प्रयास में अपना समय नहीं बिताते। वे भक्ति के बल से ही नित्य ज्ञान की साधना करते हैं।
वे जहाँ कहीं भी निवास करते हैं, जो भी वस्त्र सुलभ हो उसे पहनते हैं, और सहज ही प्राप्त भोजन से अपने शरीर का निर्वाह करते हैं।
कृष्ण भक्त कृष्ण की सेवा के आनंद में मत्त रहते हैं, और सदा कृष्ण प्रेम के रस में डूबे हुए विचरण करते हैं।
नवद्वीप में अवतरित श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से ही भक्तिविनोद यह गीत गाते हैं।