Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

ओरे मन बोलि शुनो तत्त्व बिबरण

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ओरे मन बोलि शुनो तत्त्व-बिबरण जाहार बिस्मृति-जन्य जीबेर बन्धन
अर्थ

ओ मन! सुनो, मैं तुम्हें परम सत्य का वर्णन करता हूँ, जिसे भूल जाने के कारण ही जीव बंधन में पड़ता है।

तत्त्व एक अद्वितीय अतुल्य अपार सेइ तत्त्व पर-ब्रह्म सर्ब सारात् सार
अर्थ

वह सत्य एक है, अद्वितीय, अनुपम और असीम है। वह सत्य ही परब्रह्म है, जो सबसे श्रेष्ठ में भी श्रेष्ठ है।

सेइ तत्त्व शक्तिमान सम्पूर्ण सुन्दर शक्ति शक्तिमान एक बस्तु निरन्तर
अर्थ

वह सत्य शक्तिमान, पूर्ण और सुंदर है। शक्ति और शक्तिमान सदा एक ही तत्त्व हैं, कभी भिन्न नहीं।

नित्य-शक्ति नित्य सर्ब-बिलास-पोषोक बिलासार्थ बृन्दाबन बैकुण्ठ गोलोक
अर्थ

उनकी नित्य शक्ति उनकी सभी नित्य लीलाओं का पोषण करती है। इन्हीं लीलाओं के लिए वृन्दावन, वैकुंठ और गोलोक प्रकट होते हैं।

बिलासार्थ नाम धाम गुण परिकर देश-काल-पात्र सब शक्ति अनुचर
अर्थ

लीलाओं के लिए ही भगवान के नाम, धाम, गुण और परिकर हैं। देश, काल और पात्र, ये सब उनकी शक्ति के अनुचर हैं।

शक्तिर प्रभाब आर प्रभुर विलास पर-ब्रह्म-सहे नित्य एकात्मा-प्रोकाश
अर्थ

इस प्रकार शक्ति के प्रभाव से भगवान की लीलाएँ प्रकट होती हैं। परब्रह्म अपनी शक्ति के साथ नित्य एक ही स्वरूप में प्रकट रहते हैं।

अत एब ब्रह्म आगे शक्ति कार्ज परे जे कोरे सिद्धान्त सेइ मूर्ख ए सोंसारे
अर्थ

इसलिए जो यह सिद्धांत बनाता है कि पहले ब्रह्म है और उसके बाद शक्ति और उसका कार्य, वह इस संसार में मूर्ख है।

पूर्ण-चन्द्र बोलिले किरण-सह जानि अकिरण चन्द्र-सत्ता कभु नाहि मानि
अर्थ

जब हम पूर्ण चंद्रमा कहते हैं, तो हम उसे उसकी किरणों के साथ ही जानते हैं। बिना किरणों के चंद्रमा का अस्तित्व मैं कभी नहीं मानता।

ब्रह्म आर ब्रह्म-शक्ति-सह परिकर सम-काल नित्य बोलि' मानि अतः पर
अर्थ

इसलिए मैं मानता और कहता हूँ कि ब्रह्म, उनकी शक्ति और उनके परिकर, सब एक साथ हैं और सब नित्य हैं।

अखण्ड बिलास-मोय पर-ब्रह्म जेइ अप्राकृत बृन्दाबने कृष्णचन्द्र सेइ
अर्थ

जो परब्रह्म अखंड रूप से लीलामय हैं, वे ही अप्राकृत वृन्दावन में कृष्णचंद्र के रूप में प्रकट होते हैं।

सेइ से अद्वय-तत्त्व परानन्दकार कृपाय प्रकट होइलो भारते आमार
अर्थ

वही अद्वय तत्त्व, परम आनंद स्वरूप, अपनी कृपा से हमारे भारतवर्ष में प्रकट हुआ।

कृष्ण से परम-तत्त्व प्रकृतिर पर ब्रजेते बिलास कृष्ण कोरे' निरन्तर
अर्थ

श्री कृष्ण ही वह परम तत्त्व हैं, जो प्रकृति से परे हैं। व्रज में कृष्ण निरन्तर अपनी लीलाएँ करते हैं।

चिद्-धाम-भास्कर कृष्ण तँर ज्योतिर्-गत अनन्त चित्-कण जीब तिष्ठे अबिरत
अर्थ

श्री कृष्ण चिन्मय धाम के सूर्य हैं। उनकी ज्योति में असंख्य चित्-कण, यानी जीव, सदा रहते हैं।

सेइ जीब प्रेम-धर्मी कृष्ण-गत-प्राण सदा कृष्णाकृष्ट भक्ति-सुधा कोरे' पान
अर्थ

वे जीव स्वभाव से ही प्रेममय हैं, उनका प्राण कृष्ण में ही लगा रहता है। वे सदा कृष्ण की ओर आकर्षित होकर भक्ति के अमृत का पान करते हैं।

नाना-भाब-मिश्रित पिया दास्य-रस कृष्णेर अनन्त-गुणे सदा थाके बश
अर्थ

वे विभिन्न भावों से मिश्रित दास्य रस का पान करते हैं, और श्री कृष्ण के अनंत गुणों के वश में सदा रहते हैं।

कृष्ण माता कृष्ण पिता कृष्ण सखा पति एइ सब भिन्न-भाबे कृष्ण कोरे रति
अर्थ

कृष्ण ही माता हैं, कृष्ण ही पिता हैं, कृष्ण ही सखा और पति हैं, इन सब भिन्न भिन्न भावों में कृष्ण अपने भक्तों से प्रेम करते हैं।

कृष्ण से पुरुष एक नित्य बृन्दाबने जीब-गण नारी-बृन्द रमे कृष्ण-सने
अर्थ

वृन्दावन में कृष्ण ही एकमात्र नित्य पुरुष हैं। सभी जीव, जो स्वभाव से नारी हैं, कृष्ण के साथ लीला विहार करते हैं।

सेइ तो' आनन्द-लीला जा'र नाइ अन्त अत एब कृष्ण-लीला अखण्ड अनन्त
अर्थ

यह आनंद लीला अनंत है, इसका कभी अंत नहीं होता। इसलिए कृष्ण की लीला अखंड और अनंत है।

जे सब जीबेर भोग-बञ्छा उपजिलो पुरुष भबेते ता'र जोडे प्रबेशिलो
अर्थ

जिन जीवों में कृष्ण से अलग भोग की इच्छा उत्पन्न हुई, वे पुरुष भाव को धारण करके माया के जगत में प्रवेश कर गए।

माया-कार्ज जोड माया नित्य-शक्ति-छाय कृष्ण-दासी सेइ सत्य कार-कर्त्री माया
अर्थ

यह भौतिक जगत माया की रचना है। माया भगवान की नित्य शक्ति की छाया है। वह वास्तव में कृष्ण की दासी है, और उन्हीं के आदेश का पालन करती है।

सेइ माया आदर्शेर समस्त बिशेष लोइया गठिलो बिश्व जाहे पूर्ण क्लेश
अर्थ

उसी माया ने मूल आदर्श (आध्यात्मिक जगत) की सारी विशेषताओं को लेकर यह दुःखों से भरा ब्रह्मांड रचा।

जीब जदि होइलेन कृष्ण-बहिर्मुख मायादेवी तबे ता'र जाछिलेन सुख
अर्थ

जब जीव कृष्ण से विमुख हो जाता है, तब माया देवी उसे अपने सुख प्रदान करती हैं।

माया-सुखे मत्त जीब श्री-कृष्ण भुलिलो सेइ से अबिद्या-बशे अस्मिता जन्मिलो
अर्थ

माया के सुख में उन्मत्त होकर जीव श्री कृष्ण को भूल गया, और अज्ञान के वश में उसके भीतर मिथ्या अहंकार उत्पन्न हो गया।

अस्मिता होइते होइलो मायाभिनिबेश ताहा होइते जोड-गत राग आर द्वेष
अर्थ

अस्मिता से माया में गहरा अभिनिवेश उत्पन्न हुआ, और उससे भौतिक वस्तुओं के प्रति राग और द्वेष उत्पन्न हुए।

एइ रूपे जीब कर्म-चक्रे प्रबेशिया उच्चाबच-गति-क्रमे फिरेन भ्रमिया
अर्थ

इस प्रकार जीव कर्म के चक्र में प्रवेश करके ऊँची और नीची योनियों में भटकता रहता है।

कोथा से बैकुण्ठानन्द श्री-कृष्ण-बिलास कोथा माया-गत सुख दुःख सर्ब-नाश
अर्थ

कहाँ वह वैकुंठ का आनंद, श्री कृष्ण की लीला, और कहाँ माया का यह सुख दुःख से भरा सर्वनाश!

चित्-तत्त्व होइया जीबेर मायाभिरमण अति तुच्छ जुगुप्सित अनन्त पतन
अर्थ

चित्तत्त्व होते हुए भी जीव का माया में रमण करना अत्यंत तुच्छ और घृणित है, यह उसका अनंत पतन है।

मायिक देहेर भाबाभाबे दास्य कोरि' पर-तत्त्व जीबेर कि कष्ठ आहा मोरि
अर्थ

मायिक शरीर की सेवा करते हुए, जीव अपनी वास्तविक आध्यात्मिक पहचान को भूल जाता है। हाय, यह जीव के लिए कितना बड़ा कष्ट है!

भ्रमिते भ्रमिते जदि साधु-सङ्ग होय पुनराय गुप्त नित्य-धर्मेर उदोय
अर्थ

यदि इस प्रकार भटकते भटकते जीव को साधुओं का संग प्राप्त हो जाए, तो उसका छिपा हुआ नित्य स्वभाव पुनः जाग उठता है।

साधु-सङ्गे कृष्ण-कथा होय आलोचन पूर्ब-भाब उदि' काटे मायार बन्धन
अर्थ

साधुओं के संग में कृष्ण कथा का विचार विमर्श होता है, जिससे जीव का पूर्व स्वभाव जागृत होता है और माया के बंधन कट जाते हैं।

कृष्ण प्रति जीब जबे कोरेन ईखण विद्य-रूपे माया कोरे' बन्धन-छेदन
अर्थ

जब जीव कृष्ण की ओर देखने लगता है, तब माया ही ज्ञान का रूप धारण करके उसके बंधनों को काट देती है।

मायिक जगते बिद्या नित्य बृन्दाबन जीबेर साधन-जन्य कोरे' बिभाबन
अर्थ

इस मायिक जगत में विद्या-रूपी माया ही जीव की साधना के लिए नित्य वृन्दावन को प्रकट करती है।

सेइ बृन्दाबने जीब भाबाबिष्ट हो'ये नित्य-सेबा लाभ कोरे' चैतन्य-आश्रोये
अर्थ

उस वृन्दावन में जीव भाव में डूबकर, चैतन्य महाप्रभु की शरण लेकर, नित्य सेवा को प्राप्त करता है।

प्रकटित लीला आर गोलोक-बिलास एक तत्त्व भिन्न नोय द्विबिधा प्रोकाश
अर्थ

प्रकट लीला और गोलोक की लीला, दोनों एक ही सत्य हैं, अलग नहीं, केवल दो रूपों में प्रकट होती हैं।

नित्य-लीला नित्य-दास-गणेर निलोय ए प्रकट-लीला-बद्ध-जीबेर आश्रोय
अर्थ

नित्य लीला नित्य सेवकों का निवास स्थान है, और यह प्रकट लीला बद्ध जीवों की शरणस्थली है।

अत एब बृन्दाबन जीबेर आबास असार-सोंसारे नित्य-तत्त्वेर प्रोकाश
अर्थ

इस प्रकार वृन्दावन जीव का असली निवास है। इस असार संसार में वह नित्य तत्त्व का प्रकाश है।

बृन्दाबन-लीला जीब कोरोहो आश्रोय आत्मा-गत रति-तत्त्व जहे नित्य होय
अर्थ

हे जीव! वृन्दावन-लीला की शरण लो, जिससे आत्मा का प्रेम नित्य हो जाता है।

जोड-रति-खद्योतेर आलोक अधम आत्मा-रति-सूर्जोदोये होय उपशम
अर्थ

भौतिक प्रेम जुगनू के प्रकाश जैसा तुच्छ है। जब आत्मा के प्रेम का सूर्य उगता है, तो वह बुझ जाता है।

जोड-रति-गत जत शुभाशुभ-कर्म जीबेर सम्बन्धे सब औपधिक धर्म
अर्थ

भौतिक प्रेम से जुड़े जितने भी शुभ अशुभ कर्म हैं, वे जीव के लिए केवल बाहरी उपाधियाँ हैं।

जोड-रति होइते लोक-भोग अबिरत जोड-रति ऐश्वर्जेर सदा अनुगत
अर्थ

भौतिक प्रेम से निरंतर लौकिक भोग उत्पन्न होता है, और भौतिक प्रेम सदा ऐश्वर्य के पीछे पीछे चलता है।

जोड-रति जोड-देह प्रभु-सम भाय मायिक बिषय-सुखे जीबके नाचाय
अर्थ

भौतिक प्रेम और भौतिक शरीर दोनों जीव के स्वामी के समान बन जाते हैं, और वे जीव को मायिक विषय सुखों में नचाते रहते हैं।

कभे ता'रे लो'ये जाय ब्रह्मलोक जथा कभु ता'र शिखा देय जोगैश्वर्ज-कथा
अर्थ

वे कभी उस जीव को ब्रह्मलोक तक ले जाते हैं, और कभी उसे योग के ऐश्वर्य की शिक्षा देते हैं।

जोगैश्वर्ज भोगैश्वर्ज सखलि सभोय बृन्दाबने आत्मा-रति जीबेर अभोय
अर्थ

योग का ऐश्वर्य और भोग का ऐश्वर्य, ये सभी भयपूर्ण हैं। जीव के लिए निर्भयता केवल वृन्दावन में भगवत्प्रेम में ही है।

श्री-कृष्ण-बिमुख-जन ऐश्वर्जेर आशे मायिक जोडिया सुखे बद्ध माया-पाशे
अर्थ

जो लोग श्री कृष्ण से विमुख होकर ऐश्वर्य की आशा रखते हैं, वे मायिक सुखों में बँधकर माया के बंधन में जा फँसते हैं।

अकिञ्चन आत्मा-रत कृष्ण-रति-सार जानि' भुक्ति-मुक्ति-आशा कोरे' परिहार
अर्थ

जब जीव अकिंचन होकर आत्मा में रत हो जाता है और कृष्ण प्रेम को ही सार मानता है, तब वह भोग और मुक्ति की सारी आशाओं का त्याग कर देता है।

सोंसारे जीबन-जात्रा अनायासे कोरि' नित्य-देहे नित्य-सेबे आत्मा-प्रद होरि
अर्थ

इस प्रकार वह संसार में जीवन की यात्रा सहज ही पूर्ण करता है, और अंत में श्री हरि उसे नित्य देह और नित्य सेवा प्रदान करते हैं।

बर्ण-मद बल-मद रूप-मद जत बिसर्जन दिया भक्ति-पथे हन रत
अर्थ

जाति का अभिमान, बल का अभिमान, और सौंदर्य का अभिमान, इन सबका त्याग करके वह भक्ति के पथ पर तत्पर हो जाता है।

आश्रमादि बिधानेते राग-द्वेष हीन एक-मात्र कृष्ण-भक्ति जानि' समिचीन
अर्थ

तब आश्रम आदि के विधानों में उसे राग द्वेष नहीं रहता। वह केवल कृष्ण भक्ति को ही सच्चा मार्ग मानता है।

साधु-गण-सङ्गे सदा हरि-लीला-रसे जपन कोरेन काल नित्य-धर्म-बशे
अर्थ

वह सदा साधुओं के संग में रहकर, हरि लीला के रस में डूबा हुआ, अपने नित्य धर्म के पालन में अपना समय व्यतीत करता है।

जीबन-जात्रार जन्य बैदिक-बिधान राग-द्वेष बिसर्जिया कोरेन सम्मान
अर्थ

जीवन यात्रा के लिए वैदिक नियमों का पालन करते हुए, वह राग द्वेष का त्याग करके उन्हें सम्मान देता है।

सामान्य बैदिक धर्म अर्थ-फल-प्रद अर्थ होइते काम-लभ मूढेर सम्पद
अर्थ

साधारण वैदिक धर्म धन रूपी फल देता है, और धन से भोग की प्राप्ति होती है, यह तो मूढ़ लोगों की संपत्ति है।

सेइ धर्म सेइ अर्थ सेइ काम जत स्वीकार कोरेन दिन-जापनेर मत
अर्थ

वह धर्म, अर्थ और काम को केवल दिन बिताने के साधन के रूप में स्वीकार करता है।

ताहाते जीबन-जात्रा कोरेन निर्बाह जीबनेर अर्थ कृष्ण-भक्तिर प्रबाह
अर्थ

इसी से वह अपने जीवन की यात्रा चलाता है, पर उसके जीवन का सच्चा अर्थ तो कृष्ण-भक्ति की धारा है।

अत एब लिङ्ग-हीन सदा साधु-जन द्वन्द्वातीत हो'ये कोरेन श्री-कृष्ण-भजन
अर्थ

इसलिए साधुजन सदा बाहरी चिह्नों से रहित होकर, द्वंद्वों से परे रहकर, श्री कृष्ण का भजन करते हैं।

ज्ञानेर प्रयासे काल ना कोरि' जापन भक्ति-बले नित्य-ज्ञान कोरेन साधन
अर्थ

वे ज्ञान प्राप्ति के प्रयास में अपना समय नहीं बिताते। वे भक्ति के बल से ही नित्य ज्ञान की साधना करते हैं।

जथा तथा बास कोरि' जे से बस्त्र पोरि' सु-लब्ध-भोजन-द्वारा देह राख कोरि'
अर्थ

वे जहाँ कहीं भी निवास करते हैं, जो भी वस्त्र सुलभ हो उसे पहनते हैं, और सहज ही प्राप्त भोजन से अपने शरीर का निर्वाह करते हैं।

कृष्ण-भक्त कृष्ण-सेबा-आनन्दे मतिया सदा कृष्ण-प्रेम-रसे फिरेन गहिया
अर्थ

कृष्ण भक्त कृष्ण की सेवा के आनंद में मत्त रहते हैं, और सदा कृष्ण प्रेम के रस में डूबे हुए विचरण करते हैं।

नबद्वीपे श्री-चैतन्य-प्रभु अबतार भकतिबिनोद गाय कृपाय ताँहार
अर्थ

नवद्वीप में अवतरित श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से ही भक्तिविनोद यह गीत गाते हैं।