पर तत्त्व बिचखण ब्यास आदि मुनि गण
हे हरि, हे परम सत्य! परम तत्त्व को जानने वाले व्यास आदि मुनि बार-बार शास्त्रों पर विचार करके आपके नित्य रूप, गुण और स्वभाव का गान करते हैं। हे प्रभु, आपकी लीलाएँ अमृत का सार हैं।
आपकी शुद्ध सत्त्वमयी लीलाओं को प्रमुख शास्त्रों में जीवों के कल्याण के लिए प्रकट किया गया है। परन्तु रजोगुण और तमोगुण से अंधे हुए आसुरी स्वभाव के मूढ़ लोग उन लीलाओं को समझ नहीं पाते।
इस संसार के लोग आपके नित्य स्वरूप को नहीं मानते और आपकी भक्ति नहीं करते। वे मेढक के कुएँ में पड़े रहकर आपके प्रति उदासीन बने रहते हैं। भक्तिविनोद गाते हैं, हाय, यह कैसा दुर्भाग्य है कि जो जीव स्वभाव से ही हरि के दास हैं, वे हरि तक पहुँच ही नहीं पाते।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- गीतमाला
- भाव
- पद
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