परम चैतन्य हरि ताँर शक्ति बनेश्वरी
वेद कहते हैं कि भगवान कृष्ण परम चैतन्य हैं, और उनकी दिव्य शक्ति वृन्दावन वन की स्वामिनी है। शक्तियों के स्वामी की सेवा के लिए यह परा शक्ति अपने ही स्वरूप से अनेक अन्य शक्तियों को प्रकट करती है।
आधार-शक्ति से धाम, आह्वय-शक्ति से नाम, और सन्धिनी शक्ति से सारी वस्तुएँ प्रकट होती हैं। संवित् शक्ति से ज्ञान और वे जीव प्रकट होते हैं, जो जड़ और चेतन की सीमा पर स्थित हैं। ह्लादिनी शक्ति से सखियाँ प्रकट होती हैं।
समस्त नित्य-सिद्ध सखियाँ ह्लादिनी शक्ति की ही महान विभूति हैं। ह्लादिनी शक्ति का मूल स्वरूप स्वयं श्री राधा हैं। चन्द्रावली और अन्य सभी गोपियाँ श्री राधा की ही अनुगामिनी हैं। कोई भी श्री राधा के कृष्ण-प्रेम में बाधा नहीं डाल सकता।
प्रेम की गति अत्यंत विचित्र है। यद्यपि चन्द्रावली प्रतिद्वंद्विनी प्रतीत होती हैं, तथापि वे राधा के कृष्ण-प्रेम को ही पुष्ट करती हैं। यद्यपि सभी गोपियाँ भिन्न-भिन्न शरीरों में भिन्न-भिन्न व्यक्ति हैं, तथापि वे सब एक चित्त होकर व्रज के युवा दिव्य युगल को संतुष्ट करती हैं।